समाधान
By Sheetal Keshtwal
जिंदगी की राहों में
गम का गुनहगार किसे कहूं
सफर भी मैं हूं और
हमसफर भी मैं ही हूं
सपनों की तपती धूप में
आस का बादल किसे कहूं
प्यास भी मैं हूं और
सागर भी मैं ही हूं
रंजिशो की इस दुनिया में
मोहब्बत भरा शहर किसे कहूं
वफा भी मैं हूं और
बेवफाई भी मैं ही हूं
भौतिकवाद की भागती ज़मीं पर
थमा हुआ विश्राम गृह किसे कहूं
राहगीर भी मैं हूं और
आश्रय भी मैं ही हूं
टूटते रिश्तों की डोरी का
गुनहगार किसे कहूं
समस्या भी मैं हूं और
समाधान भी मैं ही हूं ।
By Sheetal Keshtwal

Comments