समय का यथार्थ
Updated: Jul 28, 2025
By Suman Rai
किया था मैंने वक़्त पर वक़्त की क़ीमत
फिर भी मेरे लिए यह थमा ही नहीं
शायद यही है वक़्त का यथार्थ
किसी के लिए कभी रुका ही नहीं
लाख करी होशियारी, तजुर्बे से भरी तिजोरी
जताया भी बताया भी, अपना अन्दाज़ चला ही नहीं
शायद यही है वक़्त का यथार्थ
किसी के लिए कभी रुका ही नहीं
सिकंदर भी हार जाता है, मुक़द्दर भी संवर जाता है
भ्रम संशय ही रहा, प्रत्यक्ष प्रमाण पाया ही नहीं
शायद यही है वक़्त का यथार्थ
किसी के लिए कभी रुका ही नहीं
काश कोई हुनर सिखा दे, वक़्त को संजोकर रखना बता दे
समेट लूंगी सारे वह ख़ास पल, जो नादानियों में संभाला ही नहीं
शायद यही है वक़्त का यथार्थ
किसी के लिए कभी रुका ही नहीं
By Suman Rai

Comments