सब ठीक है
By Saurabh Subhash Chand
हरफ़ों के घाव सड़ रहे हैं,
जिगर के कोने में कहीं,
ना दवा है, ना दुआ ही, जानता हूँ,
पर फर्क़ है इस बार,
के जानना नहीं चाहता,
सब ठीक है...
दिनों ने दोहरा दिया,
इतिहास पुराना,
खफ़ा हूँ भी और नहीं भी,
बहुत कुछ समझ से परे है, मानता हूँ,
पर फर्क़ है इस बार,
के मानना नहीं चाहता,
सब ठीक है...
जद-ओ-जहद है, सफ़र है,
जज़्बातों का फेर है,
जूझना भी है और काटना भी,
कई अजनबी चेहरे हैं, पहचानता हूँ,
पर फर्क़ है इस बार,
पहचानना नहीं चाहता,
सब ठीक है...
By Saurabh Subhash Chand

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