सफर एक भाग दौड़…
By Osin Poddar
जिंदगी बड़ी बखूबी से जीते आया हूँ। दो रोटी खुद ना खाया लेकिन अपने बच्चों को खिलाते आया हूँ। जो भी पैसे कमाया अपनी माँ के हाथों में थमाया हूँ। घर आकर पत्नी बच्चों के लिए तोहफा लेता आया हूँ। खुद को छोड़ तुम लोगों के लिए जिंदगी जीता आया हूँ।
आज तो कह दिया मुझे फरेबी फिरना कह देना
ऐसी शिकायत मैं लाया हूँ। जिंदगी बड़ी बखूबी से जीता आया हूँ। परिवार के साथ उठता बैठता आया हूँ। मुंह पर सच बोल के कितनी बार बुरा बनता आया हूँ। जिंदगी में कभी - कभी तो खुद को भी समझ ना पाया हूँ। आज मैं जिस भी मुकाम पर आया हूँ , जिंदगी में जीत हासिल करता आया हूँ।
By Osin Poddar

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