सपनों के तीनके
By Asheshwar Saw
सपनों में जीने की आरजू अब कहां दफनाकर चला हूं बहुत दूर उनके जनाजे से ।
उन्होंने जब दी थी मेरे आशियाने को तीनके मैंने सजाया था सभी को बड़ी जागीर की तरह।
जहां रहती थी मेरे अरमानों की दुनिया उनके चाहत के अफसानो में थे मेरे उजड़ते बिलखते पलों के चेहरे ।
एक नरम हवा की छटा भी ना सह सकी मेरे आशियाने की रेत भरी दीवारें उन्हें तो मालूम था अपनी जिंदगी की सीधी राहें मुझे तो ये पगडडिंया भी साथ लेने को मैहरूम लगती हैं ।
By Asheshwar Saw

Comments