सपनों की उड़ान
By Ekta Jasan
ज़िंदगी में निराशा की पहल चल पड़े जब, थामकर अपनी उम्मीदों को जगा लो तभी, चीर दो बादलों को बिजलियों की तरह, रौशनी से महफ़िलों को जगमगा तो तभी, तभी फीर तभी कह दो, अपनी उम्मीदों से खुशियों की लहर बस से आने को अभी। मंजिलों को थामकर, सपनों में खोकर, अब की ज़िंदगी तो बस उड़ने को चली। चल पड़ी है ज़िंदगी उस किरण की तरफ़, जहाँ सपनों को थामे हैं उम्मीद की तड़प। तड़प है ज़िंदगी कि उस ख़्वाहिश की तरफ़, जहाँ सपने ही सपने मंजिलों की तरफ़। मिल जाए जो निराशा ज़िंदगी से, अगर मान कर एक चुनौती पार कर लो तभी, फिर वही राह की निराशा से बड़ी होती है ज़िंदगी।
By Ekta Jasan

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