सनातन और इस्लाम
Updated: Dec 2, 2022
Anand Kumar Shukla
एक कौम दूजे के खातिर कितनी है हो गयी पराई।
चंद इशारों पर देखा, कितनों ने खूं की नदी बहाई।।
ये विष भरी सनातन, इस्लामी आवाज़ों को सुनकर के।
मेरे दुखित ह्रदय को बस इतनी सी बात समझ में आयी।।
कि,
धर्मध्वजी हैं पंडित कितने, कितने मुल्ला हैं पाखंडी।
मानवता के बीच बना दी धर्मों की अगणित पगडण्डी।।
प्रगतिशीलता को अज्ञानी देते हैं काफ़िर की संज्ञा।
कर हत्या हत्यारा कहता नरबलि से खुश होगी चंडी।।
किसने कहा कि काली को केवल हत्यारा भक्त चाहिए।
कौन कहे इस्लाम बचने को काफ़िर का रक्त चाहिए।।
माँ जाए दो भाई-भाई को हिन्दू-मुस्लिम कहने वालों।
ह्रदय जीतने के खातिर बस निष्कामी अनुरक्ति चाहिए।।
क्या कुरान ने कहा मुसलमानों हिन्दू से नफरत करना?
या गीता ने कहा हिन्दुओं मुस्लिम को मत बंधु समझना?
मत कुरान नापाक करो तुम, गीता का अपमान मत करो।
हर धर्मों का लक्ष एक है, हर ग्रंथों का है ये कहना।।
कि,
अस्ति-चर्म सबके समान हैं, सबका लहू लाल होता है।
सुख-दुःख के तानो-बानो का सबके लिए जाल होता है।।
सभी एक छाती निचोड़ कर पौरुष और यौवन पाते हैं।
जन्म सभी को माँ देती है, सबका अंत काल होता है।।
धर्माचार्य-मौलवी गर अब चिल्लाते हैं, चिल्लाने दो।
मत नफ़रत की फसलें काटो, वो बोते हैं तो बोने दो।।
हिन्दू-मुस्लिम भेद मिटा, अप्रतिम मानव समाज बनने दो।
रामचरितमानस मस्जिद में, मंदिर में नवाज़ होने दो।।
भाषा-वेष बदलते, मानव नाते नहीं बदल सकते हैं।
इंसानों से इंसानों के रिश्ते नहीं बदल सकते हैं।।
नाम बदल सकते जग वाले, दिल कोई कैसे बदलेगा।
गति परिवर्तन हो सकता, रास्ते नहीं बदल सकते हैं।।
जब नामों का भेद मिटेगा, घटा हटेगी काली-काली।
चारों तरफ प्रेम की वर्षा होगी, फैलेगी हरियाली।।
राम-रहीम सभी पावस में झूम-झूम कर के नाचेंगे।
तब पर्वों की धूम से बागों की लचके गी डाली डाली।।
सत्यकाम की ईद मनें और मुन्ने खां की सजे दिवाली।
शमा, प्रीतिमा, रमा, फातिमा, तन-मन रंगे मनाएं होली।।
लो 'आनंद' बढ़ाये कर है, "आओ शकीला बांधो राखी।"
वो देखो उठ रही हर तरफ भाई-भाई की ही बोली।
हम सब एक चमन के गुल हैं, नहीं किसी से कोई जुदा है।
धर्म से बड़ा वतन हमारा जिस पर सारा प्यार फ़िदा है।।
मेरे पीड़ित अंतरमन की आती हरदम यही सदा है।
कि,
ईशु,राम,रहीम और नानक नाम अलग हैं, एक खुदा है।।
Anand Kumar Shukla

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