सच्चाई का दीप
By Sheetal Keshtwal
चलो नये सपने सजाते हैं
झूठ फरेब की इस दुनिया से
कुछ क्षण किनारा कर जाते हैं
रात्री के अंधेरे में ढूढें इंसानियत की रोशनी
दिन के उजाले में जो धूमिल है पडी
बूझाकर झूठे कृत्रिम उजाले को
सच्चाई का दीप जलाते हैं
चलो नये सपने सजाते हैं
झूठ फरेब की इस दुनिया से
कुछ क्षण किनारा कर जाते हैं ।
By Sheetal Keshtwal

Comments