संस्मरण
- Hashtag Kalakar
- Nov 30, 2025
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By Anu Radha
उतार चढ़ाव
घर से जल्दी निकलने की हड़बड़ी में मैं लंच बॉक्स घर पर ही भूल गई । मां से कहा सुनी हो इससे पहले ही मैं कॉलेज के लिए निकल पड़ी। इस चिंता में कि कहीं कॉलेज के पहले दिन ही लेट ना हो जाऊं ।इसलिए फटाफट बस स्टॉप पर पहुंच गई । वहां पहुंची तो देखा बस को आने में अभी देर थी । मन में रह रह कर यह बात सता रही थी, कि कहीं मैं लेट ना हो जाऊं । बस स्टॉप पर भीड़ काफी थी। हालांकि मैं घर से एक घंटा पहले ही निकली थी ताकि मैं समय पर कॉलेज पहुंच जाऊं। इतने में बस का हारन सुनाई दिया। वह स्टॉप पर आकर रुकी हम सब बस पर चढ़ गए और मैं खिड़की वाली सीट की तरफ लपकी । ताकि मैं बाहर का नजारा भी देख सकूं आज मेरा पहला दिन था कॉलेज का और मैं थोड़ा सा नर्वस फील कर रही थी। मैं बहुत खुश थी ,पर अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखकर में खिड़की से बाहर झांकने लगी मेरी सीट पर एक महिला अपने बच्चे को गोद में लिए बैठी थी वह रो रहा था और उसकी मां उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थी वह चुप ही नहीं हो रहा था। मैंने भी उसका ध्यान खींचने की कोशिश की पर वह तो रोए चले जा रहा था ।बस के सभी यात्रियों पर बच्चे के रोने का असर साफ दिखाई दे रहा था। पर कोई भी जता नहीं रहा था ।जब काफी देर तक बच्चा चुप ना हुआ तो बस में बैठी औरतों ने बच्चे की मां को टिप्स देना शुरू किया ।
कोई कहने लगी बच्चे को कुछ खाने की चीज दे दो, कोई कह रहा था शायद उसके पेट में दर्द हो रहा है, किसी ने कहा शायद से नींद आ रही है ,सब के सब उसे चुप कराने के लिए अपने अपने तरीके अपनाने लगे ।कोई कुछ तो कोई कुछ पर वो रोए जा रहा था। तभी उनका स्टाप आया और वह औरत वहां उतर गई। सब ने राहत की सांस ली ।अब मैं जरा सी खुश थी कयोकि उस बच्चे के रोने की वजह से मैं भूल गई थी कि मैं कहां जा रही हूं ।मैं क्या मेरे हिसाब से शायद सब का यही हाल था ।मैं बार-बार अपनी कलाई पर लगी घड़ी को देख रही थी ताकि समय का अनुमान लगा सकूं। अब कॉलेज आने ही वाला था मैं यही सोच रही थी कि तभी एक भिखारी गाड़ी में चढ़ा और मेरी ही सीट पर आकर बैठ गया ।मैं उसे वहां नहीं बैठाना चाहती थी। पर क्या हो सकता था ।एक बार मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा वह बहुत गंदा था। फटे पुराने कपड़े पहने और ना जाने कभी नहाया भी था या नहीं उससे बहुत बदबू आ रही थी।
मैंने बस में बैठे लोगों की तरफ नजर घुमाई तो उनमें से कुछ मुझे देख रहे थे कुछ उस भिखारी को और कुछ अपने अपने काम में व्यस्त थे ।एक पल के लिए उस भिखारी के लिए मन में घोर घृणा का भाव आने लगा ।जैसे वह मेरी दया से उस सीट पर बैठा हो ,जैसे मैं उसे साथ ले जा रही हूं। मैं उसे घूर रही थी और हताश हो रही थी कि कब स्टॉप आए और मुझे उस से छुटकारा मिल जाए ।
मेरा व्यक्तित्व एकदम बदला सा लग रहा था ।मैं समझ नहीं पा रही थी कि उस भिखारी के प्रति मेरी नफरत इतनी प्रबल क्यों हो रही थी। बहुत से भिखारी रोज ही दिखाई देते हैं पर यूं उन्हें देखकर इतनी घृणा का भाव नहीं आता ।पर आज फिर ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था ।जैसे उसने मेरे जीवन पर अधिकार कर रखा था ।एक पल में हजार बार उसके बारे में मैं सोच रही थी ।पर वह भिखारी बिल्कुल शांत था उसे कुछ भी बुरा या नया नहीं लग रहा था। वह बैठा रहा ।मैंने अपने अशांत मन को शांत करने की कोशिश की। खिड़की के बाहर झांकने लगी । कुछ देर बाद जब बस कुछ एक आध किलोमीटर दूर गई तो मैं सामान्य हो गई ।अब उस भिखारी की उपस्थिति मुझे उतना असर नहीं कर रही थी। उस दिन मेरी समझ में यह तो जरूर आ गया कि मनुष्य अपने अंदर के भाव से ही प्रभावित रहता है ।उसे क्या अच्छा लगता है क्या नहीं। कभी अपने ही विचारों और मर्यादाओं में बंध कर रह जाता है ।यह बात उस समय समझ आई कि उस भिखारी से घृणा भी बस एक ऐसा ही भाव था। जबकि वह किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहा था ।उसे भी बस में यात्रा करने का समान अधिकार था। वह भी सुविधाओं का लाभ उठा सकता था। यह मैं सोच ही रही थी कि मेरा स्टाप आ गया और मैं उतरने लगी और उतरते उतरते मैंने फिर से उस भिखारी की तरफ देखा और मुस्कुराई वह भी मुझे देख कर मुस्कुराया और मैं अपनी सोच पर हंसने लगी कि इंसान कभी कभी बहुत स्वार्थी हो जाता है और कुछ भी सोच लेता है।
राहत की सांस लेकर में कॉलेज की तरफ बढ़ी और मैं समय पर पहुंच भी गई थी ।
धन्यवाद
By Anu Radha

Nice
Great literally work maam
Nice composition maam... Keep us inspiring by ur great literally work
Really an appreciable piece of work..the way u explained such important thing in a beautiful manner is really awsome...keep it up😊
What a writing very impressive