संस्कार
By Vikas Kumar
मेरे आंखो में उनके लिए उमड़ता वो बेशुमार प्यार।
वो चाहकर भी नही कर सकती अब इश्क़ ए इज़हार।
प्रेम से लड़ता हम दोनों का तथाकथित संस्कार।
मेरे इन कपकपाते होठों से कुछ होने को है इसरार।
वो चाहकर भी नही कर सकती इसरार ए इंतजार।
प्रेम से लड़ता हम दोनों का तथाकथित संस्कार।
इन लबों को अब भी है उन लबों से तलब ए तकरार।
पर मैं चाह कर भी नही कर सकता दीदार ए महताब।
प्रेम से लड़ता हम दोनों का तथाकथित संस्कार।
अजब हीं कशमकश है जबसे कुछ रस्मों का भेंट चढ़ा है ये प्यार।
कभी इज़हार की जद तक आएगा भी दिल में सुलगता ये प्यार।
प्रेम से लड़ता हम दोनों का तथाकथित संस्कार।
प्रेम की गहराई से ज्यादा गहरे हैं क्या ये थोपे गए संस्कार।
प्रेम के बीच इतने ऊंचे होंगे दीवार तो कैसा होगा ये संसार।
प्रेम से आखिर कब तक लड़ पाएंगे ये तथाकथित संस्कार।
By Vikas Kumar

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