संवाद
By धनंजय प्रताप शर्मा
प्रश्न
जन-मन के शून्य चित्त को देखो,
कोई चादर तान सो रहा,
कोई पान करे जीवन रस,
कोई मधुशाला का जाम ढो रहा,
तू सीमा का पहला पहरी,
क्यों भटके, दर-दर, वन-वन,
क्या अवतर कोई देवलोक का,
तूने तोड़े सारे बंधन,
तेरी भी तो जननी होगी,
जिसकी कोख़-रक्त ने पाला,
तेरा भी पिता हुआ होगा,
जिसकी तू शोणित ज्वाला,
तुझको भाषा सिखलाने वाले,
वो मात-पिता भी होंगें,
बचपन साझा करने वाले,
अनुजा-अग्रज भी होंगें,
वो बामंगनी तेरी होगी,
जिसकी तू वर-कर लाया,
तू जन्मा कैसा योगी?
तू उसे छोड़, लांम पर आया,
तू पुण्यकर्म का कैसा प्रतिफल,
जो मानव योनि ठुकराता,
न मात पिता का वैरा तुझको,
तू जीवन का दांव लगाता,
तू निर्मम बालू पर सोता,
दिन-रात तपाता काया,
भूकंप, आपदा, बाढ़ या सूखा,
तूने अपना धर्म निभाया,
राजनीति केवल आडंबर,
करती बस मूर्तमान,
हे सैनिक मैं पूछ रहा,
तू मानव है या भगवान,
उत्तर
मैं ऋणी हुआ, उस माता का,
जिसने जीवन का दान दिया,
मैं ऋणी हुआ, उस जनक, पिता का,
जिसने जीवन का सार दिया,
मैं भुला न वचनों को,
ये वचन न मिथ्या होता,
ये जन्म-जन्म का गठबंधन,
विस्मृत होता न खोता,
अंतराल का साहस क्या,
जो रिश्ते-नाते तोड़े,
जब तक जीवन संभव होता,
तब तक निज हाथ न छोड़े,
जननी मेरी प्रथम नहीं,
जिस पर यह आन पड़ी है,
कोटि-कोटि जन पुत्रो पर,
भारत की नीव खड़ी है,
यह जीवन के मोह-बंधन सब,
चिता कांठ पर हैं जल जाते,
जल जातें हैं नाम, तो केवल,
बलिदान धरा पर हैं रह जाते,
हे शब्दों के शिल्पकार,
तू जानें क्या जान लुटानी,
भारत का वेघ लिए हाथों में,
निकल पड़ी यह प्रखर जवानी,
तू फ़ीकी अर्थी का स्वामी,
मुझे तिरंगी सेज मिली,
तेरे शव पर चितकार हुआ,
मेरे शव को जयकार मिली,
मैं तिल-तिल, जलते-जलते,
भी गाऊं बलिदानी गान,
हे मातृभूमि, हे जग-जननी,
मैं आया तेरे धाम।
By धनंजय प्रताप शर्मा

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