शून्य…
Updated: Sep 21, 2022
By Anjan Sharma
वैचारिक इस मंथन को मिलने वाली अब थाह नहीं ,
भ्रमित भटकना दुनिया में अब, दिखती कोई अब राह नहीं।
संगी, साथी, स्नेही, प्रियजन, इस पथ पर कोई साथ नहीं,
टिकने को अब न कंधे हैं, अब थाम लें जो वो हाथ नहीं।
अब चाह नहीं चिंताएं हैं, अब भूख है वो दरकार नहीं,
अब पूछ परख में खैर नहीं, आशाएं हैं, अब प्यार नही।
जीवन की आपा धापी में थमना तो अब एक किस्सा होगा,
उठना गिरना, गिर-गिरकर उठना अब इसका एक हिस्सा होगा।
एक और सुबह की शाम ढली अब रात का आना बाकी है,
अब जीवन के कड़वे घूंट पिलाने तैयार भाग्य का साकी है।
अब तक फूलों की राहों को कदमताल कर पार किया,
अब मंजिल तक अंगारों पर नंगे पांव ही चलना है।
अब पेड़ों की छांव नहीं, अपनों का कोई गांव नहीं,
अनजाने, तपते, बहकाते, हालातों में अब ढलना है।
कल तक जो नजदीक रही अब ओझल वो ध्येय कहां?
व्याकुल मन की गति चीख रही अब भविष्य अज्ञेय यहां।
सब शून्य का उद्भव पुनः शून्य में, दूभर अब विश्राम हुआ,
इससे उठ कर इसे नभ करना है, माटी ये जो नाम हुआ।
By Anjan Sharma

Comments