शिक्षा और संस्कार
By Ramasray Prasad Baranwal
एक दिन मैं बस स्टैन्ड पर खड़ा बस का इंतजार कर रहा था. वहाँ पर पाँच-छह लड़के जिनकी उम्र लगभग चौदह से अट्ठारह के बीच होगी, स्कूल से घर जाने के लिए खड़े होकर बस का इंतजार कर रहे थे. साथ ही साथ आपस मे हंसी मजाक भी कर रहे थे. तभी उधर से एक अंधा व्यक्ति कहीं से आया, उसे सड़क पार करनी थी. वह मदद के लिए इधर-उधर देख रहा था. तभी उन लड़कों मे से एक बोला, “देख यार बड़ा मजा आएगा, यह अंधा कैसे सड़क पार करता है।“
सभी लड़के तरह-तरह का कमेन्ट कर रहे थे और उस अंधे व्यक्ति का मजाक भी उड़ा रहे थे, मैं अभी सोच ही रहा था कि आगे जाकर उस व्यक्ति की मदद करूँ, तभी आगे का दृश्य देखकर मेरी आँखे खुली रह गई. एक कूड़ा उठानेवाला लड़का कंधे पर कूड़ा का थैला लिए पता नहीं किधर से आया और उस अंधे का हाथ पकड़कर उसे सड़क पार कराया और बिना कुछ इधर -उधर देखे अपने रास्ते चलता बना.
और मैं खड़ा - खड़ा सोचने लगा कि हमलोग कहते हैं कि शिक्षा से संस्कार आता है, परंतु यह कैसा संस्कार. आखिर इस कूड़ा उठाने वाले लड़के मे यह संस्कार कहाँ से आया, जो कि इन स्कूल जाने वाले, और पढ़ने वाले बच्चों मे नहीं आ पाया. क्या हमारी शिक्षा पद्धति मे इंसानियत नाम की चीज का कोई स्थान नही रह गया है? इसका तो अर्थ यह निकलता है कि हम बच्चों को नैतिकता के नाम पर सिर्फ और सिर्फ किताबी कीड़ा बना रहे हैं, जिनका समाज के निर्माण मे कोई भी योगदान नहीं.
By Ramasray Prasad Baranwal

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