शिक्षा
By Pratibha Patidar
मानवता को छोड़कर, घड़ा अर्थ का भरने में
लगे पड़े हैं दौड़ में, आगे निकलने की होड़ में
पढ़ा जो शिक्षकों से,पढ़ा जो कक्षाओ में
पढ़ा जो किताबों में, संग पढ़ा जो मित्रों के
सोचिए!वही किताबी शिक्षा, केवल शिक्षा है?
तकनीकी में शिक्षित होकर, चांद पर चला जाएगा
चिकित्सा में शिक्षित होकर, चिकित्सक बन जाएगा
राजनीति में शिक्षित होकर, राजनेता बन जाएगा
चंद कागज की डिग्रियों से, हां तो कुछ शिक्षित हो जाएगा।
पर तू कभी पूर्ण ना हो पाएगा।
अरे मूठ! वह शिक्षा कदापि शिक्षा नहीं है।
शिक्षा धरोहर है प्रकृति की,शिक्षा धरोहर है मानवता की
शिक्षा अमूल्य निधि है जीवन की, जिम्मेदारी है राष्ट्रहित की
स्वार्थ की भावना को छोड़कर, मानवता के रक्षा की
प्राणियों की रक्षा की, विश्व के कल्याण की।
जितना शिक्षित होना चाहेगा, खुद को अधूरा पायेगा
पर तू कभी पूर्ण ना हो पाएगा।
जीवन के हर कण में,हर क्षण में शिक्षा है
वृक्षों की अडिगता में,नदी की शीतलता में
सूर्य-चंद्र, धरा-नभ, ग्रह-नक्षत्र, सितारों में
वीरों की वीरता में, धर्म-कर्म-अर्थ में
सागर की गहराई में, सर्वत्र शिक्षा ही शिक्षा है।
जितना शिक्षित होना चाहेगा, खुद को अधूरा पाएगा
पर तू कभी पूर्ण ना हो पाएगा।
मां के स्तनपान से,मृत्यु शैय्या तक के सफर में
मां की कोख में,पिता के साये में
भाई-बहन के रिश्ते में, पत्नी की पवित्रता में
पति की कमाई में,दादा-दादी के दुलार में
शिक्षा है ईमानदारी में,शिक्षा है सच्चाई में
जितना शिक्षित होना चाहेगा, खुद को अधूरा पाएगा
पर तू कभी पूर्ण ना हो पाएगा।
By Pratibha Patidar

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