शिकस्त
By Alka Singh
आईने में देखा
एक हारा सा इन्सान था।
आंखों की वो चमक
बुझ सी गई है,
पलकों पर के आंसू
ढल से गये हैं,
माथे पे फैली शिकन
नहीं दिखती अब,
गालों पर की लाली
की रंगत उतर गई है,
होठों पे जो हंसी थी
वो चुप हो गई है,
उम्मीद से भरी आंखें
अब खाली खाली है,
वो हारा सा इंसान
अब थक चुका है।
By Alka Singh

Comments