शाम के सूरज के पंख
- Hashtag Kalakar
- Nov 29, 2025
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By Aditya Nandkumar Garde
क्षितिज पर थका हुआ सूरज, अपने सुनहरे पंख फैलाता हैं,
जैसे कोई बुढा पंछी, लंबी उड़ान के बाद ठहरता हैं।
उसके पंखों पर लिपटते हैं, दिन के सारे बोझ,
लोगों की हंसी मजाक, और छिपे हुये आंसुओं की बारिश।
इन पंखों में चमक नहीं, बल्कि धूंधला हो रहा उजाला हैं,
जो धीरे धीरे उजाले से, अंधेरे की गिरफ़्त में कैद हो रहा हैं।
शाम का सूरज, कभी जीवन की कविता का नाम था,
आज वही कविता, धुआँ और लालच की राख में आसमान में दफ़्न हैं।
पंखों पर अब रंग नहीं, बस राख जैसी परतें हैं,
जो इंसानियत की थकी सांसों, और जंगलों की चीखे समेटे हैं।
सूरज पूँछता तो हैं इंसानों से, मैं रोज लौटता हूं,
तुम्हें रोज रोशनी देने, तुम क्यों हर बार अंधेरे को जन्म देते हो।
शाम की यह आभा, कभी प्रेम की छाया थी,
अब वही छाया, इंसानियत की कब्र में भी खो गयी है।
इंसान अब आसमान नहीं देखते, वे इंसानियत को आसमान समझ रहे हैं,
पंखों का सुनहरा विस्तार, उनके लिए बस एक अनचाहा अंधेरा है।
पंछी लौट आते हैं घोंसलों की ओर, हवा लौटती हैं पेड़ों की और,
इंसान लौटता है, अपने स्वार्थ की ओर,
इंसानियत अगर सफर में हो, उतार देता है परछाई की ओर।
कभी यही शाम, गोधूलि की महक थी,
आज वही गोधूलि, धुएं और शोर से जकड़ी है।
सूरज अपने पंख समेटते हुए, धीरे धीरे लुप्त हो रहा है,
जैसे वो भी पानी मांग रहा थककर कहते हुए, “और इंसान के लिए मैं क्या करूँ?”
शाम को सूरज, अगले दिन लौटेगा जरूर,
पर शायद तब तक, इंसान अंधेरे से नाता जोड़ चुका होगा।
क्योंकि इस बार सूरज के पंख, रौशनी नहीं बल्कि सवालों की उड़ान लाएंगे,
क्या इंसानियत सचमुच, सूरज से भी पहले ढल रही है।
क्योंकि अगर इंसानियत ही, जमीन में दफ्न हो जाए,
तो फिर आसमान की रोशनी भी, सिर्फ बुराई की परछाई बन जाए।
By Aditya Nandkumar Garde

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