"शहरी संक्रमण" - By Shiv Shanker
Written By: Shiv Shanker
Category: Poetry
Competition: Poetry and Creative Writing Competition 2026
Shiv Shanker introduces us to the intricate tapestry of change through his evocative poem "शहरी संक्रमण," featured in the Poetry and Creative Writing Competition 2026. As an entry in the poetry category, this piece captures the essence of urbanization and its impact on rural landscapes and traditions. With a keen eye on the shifts occurring in society, Shanker paints a vivid picture of transformation, inviting readers to reflect on the complexities of progress and nostalgia.
About the Work
"शहरी संक्रमण" delves into the theme of urban encroachment on rural life, portraying a vivid contrast between the past and the present. The poem utilizes rich imagery and rhythmic verses to illustrate the changing face of villages as modernization takes hold. The mood is contemplative, with an underlying sense of loss as traditional ways give way to new conveniences. Shanker’s work serves as a poignant reminder of the cultural and societal shifts that accompany progress.
"शहरी संक्रमण"
Original Submission by Shiv Shanker
"शहरी संक्रमण"
सड़क अब बनने लगी है।
गाड़ी भी चलने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
बैल की जगह चल रहे हैं ट्रेक्टर,
हल की जगह कल्टीवेटर।
खेतिहर मजदूर का काम कर रहे,
कंबाइन हार्वेस्टर और थ्रेशर।।
उपज बेशक बढ़ने लगी है,
उर्वरता मगर खोने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
तांगे की जगह ई-रिक्शा ने ले ली,
कुंए की जगह हैं टुल्लू पंप।
सदियों के स्थिर परिवेश में,
शहरी संक्रमण से आ गया जंप।।
जिंदगी अब तेज चलने लगी है,
साथ ही जल्द ढलने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
अखाड़े की जगह बेटलग्राउंड ने ले ली,
गुल्ली-डंडा की जगह चल रहा जुआ।
अपाची, पल्सर और बुलेट पर,
रंगबाज उड़ा रहे धूल-धुंआ।।
तकनीक घर-घर पंहुचने लगी है,
जवानी मगर बहकने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
रील्स देखकर वक्त काट रहा,
बेरोज़गारी में लाचार युवा।
सरकारी स्कूलों के काफिले गुम गए,
प्राइवेटों की वैनों का राज हुआ।।
बदल रही है तस्वीर भविष्य की,
वर्तमान की मूरत बदलने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
चाट-समोसे पड़ गए हैं फीके,
चटकारे ले रहे चाऊमीन-मोमोज के ठेले।
त्योहारी मेलों की रौनक है गायब,
मदिरालयों पर अब लग रहे हैं मेले।।
बाजारों के स्वाद बदलने लगे हैं,
ग्राहकों की सीरत बदलने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
पन्ना,सत्तू की जगह चल रही कोल्डड्रिंक,
चना-चबैना की जगह मैगी-पास्ता।
चाय-टोस्ट ने छुड़वा दिया है,
माठा और घुघुरी का नास्ता।।
देशी फरमाइश घटने लगी है,
शहरी ख्वाहिश बढ़ने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
पुआ-फरा की जगह ब्रेड पकौड़ों ने ले ली,
सिल-बट्टा की जगह चल रही मिक्सी।
मटका की जगह फ्रीज ले रहे,
पुरानी रीत सब ले रहीं सिसकी।।
ठोस आदत हटने लगी है,
खोखली राहत मचलने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
तीन दिवसीय शादी अब,
दो घंटे में निपट रही।
बिरहा,सोहर वाली पलटन,
धीरे-धीरे सिमट रही।।
जो आयोजक थे परदेसी हो चुके,
कार्यकर्ताओं की कमी अखरने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
पेरी, जामा की जगह ले रहे,
लहंगा, कोट और शेरवानी।
नौटंकी की जगह आर्केस्ट्रा,
पत्तल-पंगत की जगह बुफे मेहमानी।।
पारम्परिक परिधान बदल चुके,
ग्रामीण परम्परा बदलने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
साईकिल, अंगोछा, पान नहीं अब,
चल रही बाईक, चश्मा और सिगरेट।
लिल्ली घोड़ी, ढपली की जगह ले रहे,
घमघमाते डीजे अप-टू-डेट।।
सादगी बिखरने लगी है,
बेअदबी निखरने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
छपरा, धन्नी की जगह ले रहे लेंटर,
बन रहे बिन पलस्तर के पक्के घर।
सब बता रहे आपबीती अपनी,
कितना गांव तक पहुंच चुका शहर।।
शहरी ढांचा गांव तक पंहुच चुका,
रह गया साजो-सज्जा का सामान।
आधा शहर गांव में लाकर,
परदेसी को फिर करना पड़ रहा प्रस्थान।।
प्रवास निरंतर जारी है,
प्रवास की तरकीब सुधरने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
जीवन भर खपता रहा शहर में
वो दिल में लेकर एक अरमान।
की लौटेगा जब गांव को अपने,
सबकुछ मिलेगा उसको पूर्व समान।।
अक्सर वो जाता रहा शहर में,
संक्रमण पंहुचता रहा गांव में ।
वो पीपल कटकर बस स्टेंड बन गया,
दरबदर ठहरता था जिसकी छांव में।।
ठौर की उम्मीद अब घटने लगी है,
कुछ देर रुककर, बस फिर चलने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
बदलाव अगर जो होना ही था,
तो होता वो सुविधाओं में।
ग्रामत्व सुरक्षित रहता यथावत,
नगरत्व फैलता चारों दिशाओं में।।
चारदिवारी तो चमकने लगी है,
बुनियाद मगर दरकने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
सड़क अब बनने लगी है,
गाडी भी चलने लगी है।
शहरी संक्रमण जोरों पर है,
गांवों की सूरत बदलने लगी है।।
About the Competition
The Poetry and Creative Writing Competition 2026 organized by Hashtag Kalakar serves as a platform for artists to express their creativity and share their unique perspectives with a wider audience. This competition celebrates the power of words and the beauty of literary expression, inviting participants from diverse backgrounds to showcase their talent in poetry, essays, and creative writing.
We extend our sincere appreciation to Shiv Shanker for his insightful contribution, "शहरी संक्रमण," to the Poetry and Creative Writing Competition 2026. His ability to weave themes of urbanization and cultural change into a compelling narrative is truly commendable. Thank you, Shiv, for sharing your voice and enriching our understanding of societal transformations.
About Hashtag Kalakar
Hashtag Kalakar is a creative platform dedicated to providing artists, writers, singers and other creative talents with opportunities to showcase their work and reach wider audiences through competitions, features and creative initiatives.

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