शहर का आलम
By Wamiq Zia
आँखों में ख़ामोशी भर जाती है, लफ़्ज़ बग़ावत करते हैं
जो देखें हैं मंज़र मैंने इंसाँ की पामाली के
शहर का आलम जो मैं कह दूँ दश्त के जैसा लगता है
चारागर लाचार बहुत हैं, हाथ वो मलते आते हैं
पिंजरे में हैं क़ैद जो पंछी, आज़ादी से घबराते हैं
गली गली कोहराम मचा है, देखो कैसा सन्नाटा है
जो गलियारे रौशन थे अब तक, गिरिया हाय सुनाते हैं
चंचल चलती नदी को देखो, आँसू आज बहाती है
शग़ुफ़्ता चेहरे बुझे हुए हैं, कैसे दर्द छुपाते हैं
मसले सारे गए हैं शायद, साहेब के दरवाज़े तक
वो जो चुने गए थे रहबर, साज़ ए जरस बजाते हैं
उश्शाक़ की बस्ती अंधियारी है, हुस्न का परचम बेरंग है
मेले जैसे थे जो आँगन, आतिशी रंग दिखाते हैं
बच्चों के सर नंगे हैं और माओं की गोदें सूनी हैं
लिखने वाले गुमन ज़रों सेमाज़ी की ख़ाक उड़ाते हैं
By Wamiq Zia

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