शबीह ऐ हवेली
By Jeeshant mathur
तेरी दीवारों की यह उतरती पपड़िया
मेरी मोहब्बत कि पुरानी साथी रहीं हैं,
कौन देखना आया,
कौन, देख कर गया,
तूने किनको नज़र अंदाज़ किया,
तू किनसे शर्माती रही हैं
यह शबीह ए हवेली होना हैं खत्म इसी महीने,
तू भी तारीक ए निकाह काफी सरकाती रही हैं
कर लिया ना दीदार तूने तेरे खुदा की दीद का,
जिसके सदके में तू रोज़े पर रोज़े उठाती रही हैं
आने वाली बारिशों में तेरे आसूं तो छुप जाएंगे सबा,
उन निशानियों का क्या जो तू कलाई पर गुदवाती रही हैं,
जिंदगी भर मिटाने को हो गया एक दाग तेरे हिस्से
जिस दाग को तू बड़ी अज़मत से दिखाती रही हैं,
मोहब्बत क्या चीज़ हैं यार जान को हिम्मत से भरती हैं,
उस का भी सर उठा दिया ता उम्र सर जो झुकाती रही हैं
सुन, तेरे जाने के बाद मैने वोह पेशा ही छोड़ दिया,
पर हवेली के काम की खबर मुझ तक आतीं रही हैं
पपड़िया तेरी खिड़की कि अभी तक ना हुई सही,
जो अक्सर हमारी मुलाकात पर गिरजाती रही हैं
मैं तुझको चुभता रहूंगा किसी बेरहम दिल के दर्द कि तरह,
जिसे लोगो से तू सीने कि टीस कहकर छुपाती रहीं हैं
शायद मुकम्मल हो मोहब्बत अगली विलादात में,
जिसका तमाशा मुसलसल यह दुनिया बनाती रही हैं
By Jeeshant mathur

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