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वक़्त है

By Rashmi Abhay


आज पूरे चार महीने हो गए थे मानस को गए हुए,नैनीताल जाते हुए गाड़ी खड्ड में गिर गई थी मगर किसी को बॉडी नही मिली। उनके जाते ही परिस्थितियां कितनी बदल गई ये सोचते हीं नेहा की आंखों से आंसू निकल आये। पांच महीने का गर्भ संभाले हुए वो सबकी आवश्यकताओं का ख्याल रखती मगर मानस के जाने के बाद जैसे उस घर को या घरवालों को उसकी कोई आवश्यकता हीं नही रह गई थी।सुबह से रात तक वो सबकी तीमारदारी में लगी रहती है। उसे याद है जब उसने मानस को माँ बनने की खुशखबरी दी थी...कितना खुश था वो..उसे बाहों में लेकर एकदम से चूम लिया था और कानों में फुसफुसा कर बोला था 'मुझे तो बस बेटी चाहिए वो भी बिल्कुल तुम्हारी तरह।' घर में तो जैसे अनाउंसमेंट कर दिया था कि नेहा अभी कोई काम नही करेगी।सभी बहुत खुश थे, मगर ये खुशियां ईश्वर को रास नही आई और उसने मानस को उससे छीन लिया। जो मानस उसे पलकों पर बिठा कर रखता था उसी के न रहने पर उसकी औकात अपने हीं घर में नौकरानी जैसी हो गई थी। वक़्त कब ठहरा है जो अब ठहरता..आखिर नेहा की डिलीवरी का भी वक़्त आ गया। उसे जिस हॉस्पिटल में भर्ती किया गया उसी हॉस्पिटल में उसके बगल के वार्ड में एक व्यक्ति लंबे समय से कोमा में था। नेहा को लेबर पेन शुरू था मगर पेट के अंदर बच्चे की कंडीशन सही नही थी तो डॉक्टर ने सर्जरी करना उचित समझा।




नेहा नें एक बहुत ही खूबसूरत बेटी को जन्म दिया था..मानस को याद करके उसकी आंखें भर आईं और उसने मन ही मन निर्णय लिया कि इसका नाम 'मानसी' रहेगा। वो इन्हीं सोचो में खोई रहती अगर उसे नर्स की बातें सुनाई नही देती। दो नर्सें आपस में बातें कर रही थी' अरे वो जो बगल वाले वार्ड में जो बंदा है वो 8 महीने बाद कोमा से बाहर निकला है और बार बार किसी नेहा को ढूंढ रहा है, अब हमलोगों के पास तो उसका पता भी नही जो किसी को खबर करें। इतनी बातें सुनकर ना जाने क्यूँ उसके हृदय में आशा की एक किरण जाग उठी।क्योंकि मानस के एक्सीडेंट को भी 8 महीने ही हुए थे। उसने नर्स से कहा कि क्या मैं बगल वाले मरीज से मिल सकती हूं.. नर्स ने साफ इंकार कर दिया कि नही अभी आपकी सर्जरी हुई है आप कहीं नही जाएंगी, मगर नर्स से बहुत बार आग्रह करने पर वो मान गई और उसे बगल के वार्ड के दरवाजे पर ले गई। नेहा की सोच बिल्कुल सही निकली...वो कोई और नही उसका मानस ही था जो अर्द्ध निद्रा में अब भी उसी का नाम ले रहा था। नेहा नें एकदम से नर्स से अपनी बेटी को लाने को कहा...और मानस के चेहरे को अपनी हथेलियों में भरकर बोली 'देखो मानस तुम्हारी नेहा तुम्हारे पास है और तुम्हारी गुड़िया भी।' नेहा की आवाज़ सुनकर मानस को अब पूरा होश आ चुका था, उसने पूरी ताकत से नेहा का हाथ थाम लिए जैसे अब फिर कहीं बिछड़ ना जाये। इसी बीच नर्स उनकी बेटी को लेकर आ गई थी, मानस उसे अपने सीने से जकड़ लेना चाहता था मगर कमजोरी की वजह से डॉक्टर नें उसे उठने को मना किया था। नेहा ने बताया उसे कि उसने बिटिया का नाम मानसी रखा है। आज नेहा और मानस को संसार की सारी खुशियां मिल चुकी थी। घर से भी सभी आ चुके थे और मानस को देखते हीं नेहा के प्रति उनका रवैया बिल्कुल बदल गया। सब समझते हुए भी नेहा नें खामोश रहना ही उचित समझा ये सोचते हुए कि वक़्त है।



By Rashmi Abhay




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