वो अबला
By Saarakshi Tiwari
जो कष्ट मुझे जन्म देते हुए लिए थे उसने ,
जो दर्द सहा था अपने परिवार से बिछड़कर उसने ।
कभी अपना लिहाज़ा नहीं भूली ,
अपने नफ़्स से कभी उसका उल्लेख नहीं बोली।
उसका लहज़ा कभी ग़लत नहीं था ,
बस दूसरों का नज़रिया था जो अंधा हो गया था ।
साँझ में उसने अपने धर्म को निभाया ,
प्रातः उसने अपना कर्म सिंचाया।
जब उसके मान ,
जब उसके सम्मान ,
जब उसकी नफ़्स का अनादर हुआ ,
कोई नहीं था उसके साथ खड़ा ।
पर थी तो एक अबला ,
उसकी शक्ति का माप अतुलनीय ,
उसका प्रेम हो या उसकी अलबेली शक्ति।
अकेले ही तूफ़ान को अपने आगे झुकाया ,
अकेले ही उस तूफ़ान की उसने पलट दी वो काया ,
उसकी कहानी हैं अद्वितीय ।
उसकी पायल की वो झंकार ,
जैसे कोई प्रेम की पुकार ।
उस अबला की शक्ति ,
उस अबला की प्रेरणा भक्ति ,
उसको एक स्त्री बनाती हैं ,
उसकी भावनाओं को साझा करना ,
एक अत्यंत कठिन दास्ताँ का संकेत हैं ,
अत्यंत भावपूर्ण हैं ।
वो नारी हैं ,
वो एक माँ है ,वो एक बहन हैं , वो एक पत्नी हैं ।
नारी शक्ति ही यह धरती बनाती हैं ।
एक अबला का अपमान न करना ,
क्यूँकि वो पुरुष भी उसी की गोद में पला ।
वो ही जननी हैं ,
वो आत्मनिर्भर हैं ।
नारी के बिना तो पुरुष भी एक ,
मामूली से कण की तरह मिट्टी में मिल जाता हैं ……
By Saarakshi Tiwari

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