वेश्या
By Yogesh Verma
अति सुंदर, जैसे हूर, किंतु मुख पर, ना मुस्कुराहट है। आज का विषय, वेश्या जनाब है। आये थे, एक आश में, सपनों की, तलाश में, सपना था, कोई बड़ा नहीं, बस पेट था, भरा नहीं, अभागी किस्मत ने, ना साथ निभाया, इच्छा विरुद्ध, वेश्या बनाया।
वरना, जन्म से, कौन सपने लाता है? कि जिस्म बेचकर, खाना चाहता है। पहली बार, जबरन मारपीट जोर आजमाया, जिस्म को नोच-नोच, इन गिद्धों ने खाया, जब कुछ शेष, ना बच पाया, सजा-धजा सड़क किनारे खड़ाया। समय के साथ, स्वयं श्रृंगार कर, वक्त से पहले पहुंच जाती है, जो जिस्म, कभी इज्जत था, उसे बेचकर खाती है। अभी संघर्ष, मिटा नही बहुत बाकी है, वासना ग्रस्त को खींच, सुंदर चमड़ी लाती है, और, ढल गई जब चमड़ी, वह पुनः अभागी है। अंत में, दोषी मजबूर नहीं, मजबूरी का लाभ उठाने वाले हैं, वेश्या वह नहीं, उनसे प्यास बुझाने वाले हैं।
By Yogesh Verma

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