वृक्ष
By Dhruwa Shankar Prasad
सांसें देकर
ईंधन देकर
छाया देकर
खुशबू देकर
दवा देकर
क्षुधा मिटाकर
हमारे घरों को सजा कर
हममें हैं ये आस जगाते
हममें हैं ये जीवन भर जाते
हम इनके कर्जदार बन जाते
ये इतने महान होते
इनके नीचे है कोई बुद्ध बन जाता
कोई है न्यूटन बन जाता
फिर क्यों मानव संवेदनशील नहीं रह पाता ?
क्या ऐसे इतिहास है भव्य बन पाता ?
अंगुलीमार तो थम गया
बुद्ध उसे था मिल गया
बुद्ध आज भी है हमारे मन में
पल भर , हम झांकें तो मन में
आओ , हम भारतीय बन जाएं
अपनी धरोहर हम बचाएं
वृक्षारोपण का लेकर पावन प्रण
ऋण अपना हम चुकाएं
धरती मां को हम बचाएं
धरती मां को हम बचाएं !
By Dhruwa Shankar Prasad

वृक्ष को बचाने के लिए जरूरत है
Nice poem
👍
Very nice