वीरान लम्हे
By Sarthak Shankar Chaturvedi
हम बचे भी तो जैसे कोई रुह-ए-ग़म बचे,
अब जो भी था कभी दिल में, दोहराना मत।
भीगती रात में ख़्वाब भीगे थे कुछ,
अब उन अश्कों को आँखों से बरसाना मत।
जिस दरीचे से रोशन था तेरा नाम कभी,
अब वहाँ धूप भी आए तो ठहराना मत।
तेरे बिन एक शम्अ जली थी हँस के मगर,
उस उजाले में अब ख़ुद को जलाना मत।
ज़ख़्म थे, मेरी रूह की तजवीज़ थे,
अब उन्हें चौराहों पे सुनाना मत।
मैंने वीरान लम्हों को बुन लिया है कफ़न,
उन सलीबों को अब आ के सजाना मत।
राख बाक़ी है बस, शोले सभी नींद में हैं,
इस तअल्लुक़ को फिर से सुलगाना मत।
सार्थक अब किसी नाम का तअल्लुक़ नहीं,
जो भी लिखा है काग़ज़ पे, मिटाना मत।
By Sarthak Shankar Chaturvedi

Such a talented writer
✨✨
Well done