“विस्मय”...
Updated: Oct 1, 2024
By Anurag Saxena
न उसमें गुड़ की मिठास थी,
न उसने शक्कर घोली,
दो मीठे लब्ज़ बोलकर
उसने रिश्ता मीठा कर दिया।।
न गुड़ की मिठास .....
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न मैंने उससे कुछ पूछा
न उसने मझसे कुछ कहा,
ज़िंदगी की सच्चाई को
उसने दिल में छुपा के रखा
इक, छोटी सी विस्मय देकर,
मानो…उसने सब कुछ बयां कर दिया
न गुड़ की मिठास .....
*****
ज़िंदगी बस दो पल की ,
मंज़िले कुछ नाज़ुक हैं
रास्ते कुछ कठिन से हैं
पर दिल बहुत मास़ूम है,
मेरे बढ़ते कदम की थकावट को,
उसने महसूस कर लिया
दो पल का दिल में आश्रय देकर,
उसने रिश्ता मीठा कर दिया।
न गुड़ की मिठास .....
*****
कल मिले या न मिले
या मिल के फिर बिछड़ जाएं,
ज़िंदगी के किस मोड़ पर
कल न जाने, हम कहाँ जाएं,
हाथ के इशारे से…...
मानो उसने फिर मिलने….. का
वादा कर दिया,
न गुड़ की मिठास .....
By Anurag Saxena

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