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विवेकी होना चतुर होने से हमेशा बेहतर

By Dr. Vibhav Saxena


मानव को ईश्वर की सर्वोत्तम कृति कहा जाता है। चौरासी लाख योनियों में उसे सर्वश्रेष्ठ योनि का स्थान प्राप्त है। वास्तव में मनुष्य ने अपने गुणों के बल पर ही स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया है। उसका ज्ञान एक ऐसा तत्व है जिसके बल पर उसने न केवल प्रकृति से प्राप्त संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग किया वरन अन्य जीव-जंतुओं पर भी अपनी श्रेष्ठता को प्रमाणित किया है। यह भी समझना आवश्यक है कि केवल मानव होने मात्र से ही किसी भी व्यक्ति को श्रेष्ठ होने का दर्जा प्राप्त नहीं होता, बल्कि उसे अपने गुणों के बल पर स्वयं को बेहतर सिद्ध करना पड़ता है। मनुष्य जिन गुणों या विशेषताओं के आधार पर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ प्रमाणित करता है,  उनमें बल, बुद्धि, साहस, ईमानदारी, धैर्य, संयम तथा विवेक और चतुराई आदि प्रमुख हैं। ध्यान देने योग्य है कि प्रत्येक मनुष्य में ये सभी गुण होना अनिवार्य नहीं है, किंतु चतुराई और विवेक ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक प्राणी में लगभग समान रूप से पाए जाते हैं और इन दोनों गुणों की परस्पर तुलना भी प्रायः की जाती है। ऐसे में इन दोनों में से कौन सा गुण अधिक श्रेष्ठ है, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है।


अब यदि चतुराई के विषय में बात की जाए तो हम यह कह सकते हैं कि चतुराई सामान्यतः चतुर होने का भाव है तथा इसे बुद्धिमत्ता, कुशलता, निपुणता, चालाकी तथा धूर्तता आदि के नाम से भी जाना जाता है। एक विद्वान के अनुसार, "दूसरों से आप जो चाहते हैं, उसे प्राप्त करने के लिए स्वयं के व्यवहार को विनियमित करने की क्षमता ही आपकी चतुराई है। यह आंतरिक रूप से आत्ममुग्धता या चालाकी नहीं है, बल्कि सामाजिक कौशल को संदर्भित करती है जो किसी को दूसरों के साथ उत्पादक रूप से काम करने की अनुमति देती है।" इस अर्थ में यह भावनात्मक बुद्धिमत्ता की अवधारणाओं से निकटता से संबंधित है ।


चतुर व्यवहार के उपकरणों में चापलूसी, अप्रत्यक्षता, सुनना, विवेक, पारस्परिक परोपकारिता, राजनीति और सामरिक तर्क आदि सम्मिलित होते हैं। चतुराई को समझने के लिए निम उदाहरणों की सहायता ली जा सकती है- यदि कोई अपने उद्देश्य के अनुरूप कार्य कर रहा है किंतु आप उस कार्य को पसंद नहीं करते तब भी उसे पसंद करने का दिखावा करना चतुराई है। किसी से कुछ पाने या लेने के मार्ग में यदि आपकी भावनाएं बाधक बन सकती हैं तो उन भावनाओं को नियंत्रित रखना चतुरता है। इसी प्रकार दूसरों से अच्छा व्यवहार करना तथा उनसे अधिकतम लाभ लेने की योग्यता भी एक चतुर व्यक्ति होने का लक्षण है। स्वयं को दूसरों से कम योग्य दर्शाते हुए उनके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना और अपनी उद्देश्य पूर्ति हेतु उसी के अनुसार प्रयास करना चतुराई है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के स्वभाव अथवा व्यवहार में परिवर्तन करने और उसे अपने अनुरूप ढालने की क्षमता भी आपके चतुर होने का प्रमाण है।


वस्तुत: लोगों को चतुराई और ज्ञान के बीच का अंतर पता नहीं है और वे प्रायः बुद्धि को चतुराई समझने की गलती करते हैं जो सही नहीं है। असाधारण के भाव से विशेष रूप से संबंधित होने के कारण, मेधा शक्ति एक व्यक्ति को सांसारिक मामलों में चतुर होने और समाज में सफलता प्राप्त करने में सहायक होगी किन्तु यह कोई आशीर्वाद नहीं है। एक अधिक चतुर व्यक्ति बेचैन रहता है, शांति का आनंद नहीं ले पाता और अवसाद से घिरा रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने अहंकार का दास बनकर रह जाता है और उसकी बुद्धि का ह्रास हो जाता है। वह स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ समझता है और अपनी चतुराई के बल पर दूसरों को मूर्ख बनाकर स्वयं को महान सिद्ध करने में लगा रहता है।


यद्यपि चतुराई मानव का आवश्यक गुण नहीं है तथापि इस भौतिकतावादी युग में चतुराई को अत्यधिक महत्व दिया जाने लगा है जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसा नहीं है कि चतुर होना कोई बुरी बात है। चतुराई हमें परीक्षा में अंक प्राप्त करने, दूसरों पर अपना प्रभुत्व जमाने और वाद-विवाद आदि जीतने में सहायक सिद्ध हो सकती है किंतु अधिक चतुराई अंततः व्यक्ति विशेष के लिए हानिप्रद ही सिद्ध होती है, इसमें कोई संदेह नहीं है।


अब यदि विवेक के बारे में बात की जाए तो विवेक तीक्ष्ण धारणा प्राप्त करने या अच्छी तरह से न्याय करने की क्षमता या ऐसा करने की गतिविधि है। निर्णय के सन्दर्भ में विवेक प्रकृति में मनोवैज्ञानिक, नैतिक या सौंदर्यवादी हो सकता है। दुनिया की वास्तविकता को समझना और उसी के अनुरूप व्यवहार करना एक विवेकी मनुष्य का लक्षण है। इसी प्रकार क्या होना चाहिए इसका निर्णय करना और उसी के अनुसार मूल्यों पर चलना ही विवेक है। सांसारिक संबंधों में औपचारिकता पूर्वक व्यवहार करने की क्षमता भी विवेक में सम्मिलित है। एक समझदार व्यक्ति को ज्ञान रखने वाला और अच्छा निर्णय लेने वाला माना जाता है यदि उसमें विवेक का लक्षण विद्यमान हो।


विवेक संस्कृत का एक शब्द है जिसका प्रयोग असंस्कृतभाषी भी प्रतिदिन करते हैं। कई भाषाओं में इसका अर्थ बुद्धि होता है किन्तु व्यापक रूप में इसका अर्थ भेद करने की शक्ति माना जाता है परन्तु इस शब्द की व्युत्पत्ति और अन्य अर्थ भी जानना आवश्यक है।


विवेक विच् धातु में 'वि' उपसर्ग को जोड़कर बनाया गया है। विच् का अर्थ है परे, पृथक, वंचित, भेद, विचार या न्याय। अतः विवेक का अर्थ है भेद करना, निर्णय करना, प्रभेद करना, बुद्धि-विचार, अंतर, सच्चा ज्ञान, सही निर्णय आदि। विवेक का एक अर्थ वास्तविक गुणों के आधार पर वस्तुओं का वर्गीकरण करने की क्षमता भी है।


वेदांत में, विवेक का अर्थ अदृश्य ब्रह्म को दृश्य जगत से, पदार्थ से आत्मा, असत्य से सत्य, मात्र भोग या भ्रम से वास्तविकता को पृथक करने की क्षमता है। वास्तविकता और भ्रम एक दूसरे की ऊपर उसी तरह अद्यारोपित हैं जैसे पुरुष और प्रकृति, इनके बीच भेद करना विवेक है। यह अनुभवजन्य संसार से स्वयं या आत्मान का भेद करने की क्षमता है। विवेक, वास्तविक और असत्य के बीच की समझ है जो इस बात को समझती है कि ब्रह्म वास्तविक है और ब्रह्म के अतिरिक्त सब कुछ असत्य है। इसका अर्थ धर्म अनुरूप और धर्म प्रतिकूल कार्यों के बीच अंतर करने की क्षमता भी है। विवेक उस गहन चिंतन को धारण करता है जो किसी भी व्यक्ति को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की क्षणभंगुरता की समझ देता है। यह वास्तविकता की समझ है।


परम-हंस या पौराणिक हंस की दूध और पानी में भेद करने की क्षमता (नीर-क्षीर विवेक) के कारण उसके विवेक को उच्चतम माना जाता है। विवेक का अभ्यास निरंतर प्रश्न एवं समालोचनात्मक विचार-विमर्श से किया जाता है।


अब यदि चतुराई और विवेक की तुलना की जाए तो चतुराई को एक ऐसे कौशल के रूप में देखा जा सकता है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति दूसरों को अपने प्रभाव में ले सकता है और अपनी उद्देश्य पूर्ति के लिए अपनी चतुराई का प्रयोग कर सकता है। चतुराई एक ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में सही निर्णय लेने में सहायता करती है। एक चतुर व्यक्ति मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों से बाहर निकलने का समाधान सरलता से ढूंढ लेता है और वह केवल अपनी ही नहीं बल्कि दूसरों की समस्याओं को भी हल करने में सक्षम होता है। चतुराई को किसी व्यक्ति की निपुणता के रूप में भी देखा जाता है और यह विभिन्न व्यक्तियों के लिए स्वार्थ पूर्ति का साधन भी होती है। ऐसा नहीं है कि चतुराई कोई दुर्गुण है किंतु अधिक चतुर मनुष्य धीरे-धीरे स्वार्थ के वशीभूत हो जाता है और वह अपनी चतुराई का उपयोग दूसरों को नीचा दिखाने अथवा स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में ही करता है। उसे लगता है कि वह जिसे चाहे उसे मूर्ख बना सकता है और यही स्थिति उसे अहंकार तक ले जाती है। ऐसे में स्वार्थ और अहंकार के वशीभूत होकर व्यक्ति अपने पतन का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त करता है जिसके मूल में उसकी चतुराई ही होती है।


जहां चतुराई एक ओर मनुष्य के लिए वरदान सिद्ध होती है तो वहीं दूसरी ओर उसे अभिशाप में परिवर्तित होने में भी देर नहीं लगती। इसके विपरीत विवेक एक ऐसा गुण है जो प्रत्येक स्थिति में मनुष्य के लिए लाभदायक ही सिद्ध होता है। परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, विवेकी मनुष्य ना तो अहंकार के वशीभूत होते हैं और ना ही चिंता के अथाह सागर में डूबते हैं। उनका विवेक ही उनके लिए सबसे बड़ा वरदान होता है। वे संसार की वास्तविकता को भली प्रकार समझते हुए प्रत्येक व्यक्ति के साथ यथोचित व्यवहार करते हैं और संसार की कोई भी भौतिक वस्तु अथवा सुख समृद्धि उनको लालसा के वशीभूत नहीं कर पाती। उनका प्रत्येक निर्णय विवेकपूर्ण होता है। इस कारण प्रायः उन्हें अपने जीवन में किसी निर्णय को लेकर पछताना नहीं पड़ता। विवेकी मनुष्य ना केवल अपने लिए बल्कि अपने से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए सच्चे सहायक तथा सलाहकार सिद्ध होते हैं और स्वयं के साथ-साथ दूसरों की उन्नति का भी मार्ग प्रशस्त करते हैं। वस्तुत: विवेकी व्यक्ति भी चतुर होते हैं किंतु वह अपनी बुद्धि का उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से करते हैं। ऐसी स्थिति में उनका ज्ञान उनके या अन्य किसी के लिए घातक सिद्ध नहीं होता। इस प्रकार विवेकी होना चतुर होने से बेहतर ही सिद्ध होता है।


चतुराई और विवेक की तुलना करते हुए एक कहानी स्वयं ही स्मरण हो आती है। बहुत समय पहले, एक गांव में चार मित्र रहा करते थे। उन्होंने अपने गुरु से विभिन्न प्रकार की विद्याएं प्राप्त की थीं। उनमें से तीन को अपनी विद्या और चतुराई पर बहुत अभिमान था और उन्हें यह लगता था कि वे जो भी करेंगे वही सही होगा। इसके विपरीत चौथा मित्र उन की भांति चतुर तो नहीं था किंतु वह कब क्या निर्णय करना है, इसका ज्ञान रखता था अर्थात वह प्रत्येक परिस्थिति को भलीभांति समझ कर उसके अनुसार ही विवेकपूर्ण ढंग से उचित निर्णय लेने में विश्वास रखता था।


एक दिन सभी मित्रों ने दूर के शहरों में धन कमाने के लिए जाने का निश्चय लिया और वे चारों अपने प्रवास पर निकल गए। चलते चलते वे एक वन को पार कर रहे थे कि उन्हें शेर की हड्डियों का एक ढांचा मिला।


पहला मित्र बोला, "यह एक अच्छा तरीका है अपनी प्रज्ञता का प्रदर्शन करने का, चलो इस शेर में प्राण डाल देते हैं!"

पहले दोस्त ने उन हड्डियों को एकत्रित कर उसका कंकाल बना दिया। दूसरे ने उस पर मांस और ऊतक डाल दिया। अब वह एक साधारण शेर लग रहा था किंतु प्राण हीन था। 


अब तीसरे मित्र ने अपनी विद्या के माध्यम से उसमें प्राण डालने की बात की। वह शेर के कंकाल में प्राण डालने वाला ही था कि चौथे मित्र ने उसको रोकते हुए कहा, "यदि हम इसे जीवित कर देंगे तो हमारे लिए बहुत गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।"


इस पर बाकी तीनों मित्रों ने कहा, "अरे तुम तो बिल्कुल मूर्ख और डरपोक हो। इसलिए तुम चुप ही रहो।" उसके बार-बार समझाने पर भी तीनों मित्र उसकी सलाह मानने को तैयार नहीं हुए और जब उसने देखा कि तीसरा मित्र शेर को जीवित करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर चुका है तो वह कुछ दूरी पर स्थित एक पेड़ पर चढ़ गया। यह देख कर बाकी तीनों मित्र उसका उपहास करने लगे।


इसके बाद तीसरे मित्र ने शेर के कंकाल में प्राण फूंक दिए। जैसे ही शेर जीवित हुआ, उसने उन तीनों को घूर कर देखा और उनकी और बढ़ने लगा। शेर को अपनी ओर आते देख कर तीनों भय से कांपने लगे और उन्हें अपनी चतुराई तथा अपने मित्र के विवेकपूर्ण परामर्श को ना मानने पर पछतावा होने लगा। शेर ने उन पर हमला कर तीनों के प्राण हर लिए और वन में गायब हो गया। इस प्रकार तीनों मित्रों को अपनी चतुराई के कारण अपने प्राण गंवाने पड़े जबकि चौथे मित्र के विवेकी स्वभाव के कारण वह जीवित बच गया।


ध्यान देने योग्य तथ्य है कि चतुराई एक सांसारिक कौशल है जिसका हमारे मन या आत्मा से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। इसके विपरीत विवेक हमारे मन और आत्मा की आवाज है और विवेकपूर्ण ढंग से किया हुआ कोई भी कार्य कभी भी गलत नहीं होता तथा विवेकी व्यक्ति हर हाल में संतुष्ट रहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रसिद्ध विद्वान एलेन एल्डा ने कहा था, "आप जितना हो सके, उतने चतुर बनें लेकिन याद रखें कि विवेकी होना चतुर होने से हमेशा बेहतर है।"


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