विनय करे वसुंधरा
Updated: Aug 6, 2025
By Mukta Sharma Tripathi
स्वार्थ का प्रवाह प्रखर।
अग्नि शर, चलाए नर।
क्यों धैर्य, धरे धरा?
दग्ध हृदया, वसुंधरा।।
जल जीव, दैन्य निर्जीव।
चीत-कार करें, सजीव?
गर्भ में ना, रत्न रहा।
अश्रु बहाए, वसुंधरा।
वनस्पति अभिशप्त है।
खग - विहग संतप्त हैं।
उर्वी ना रही, उर्वरा।
चेता रही, वसुंधरा॥
हरित क़ालीन कहाँ गया?
नील नभ कौन, निगल गया ?
क्षितिज दर्श दिखा, ज़रा।
ढूँढ रही, वसुंधरा।।
रोग रौद्र रूप धर।
रक्त बीज हर डगर।
रुग्ण महि, रही डरा।
क्या करे वसुंधरा?
विष धरा को क्षारता।
प्रलय-प्रलय पुकारता।
नर ! अभी संभल ज़रा।
विनय करे, वसुंधरा।।
By Mukta Sharma Tripathi

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