विदाई
By Nirupama Bissa
आज बहुत कोशिशों के बाद भी उसकी रुलाई नहीं रुक रही थी।
वक्त को कैद करके रखना चाहती थी , समय को रोक लेना चाहती थी।
लग रहा था जैसे सब कुछ पीछे छूटता जा रहा है । घर का हर सदस्य आ आ कर उसके गले लग रहा था । सभी की आंखों में नमी थी ।
हंसते हुए छोटा भाई आया और बोला "देख तू रो मत " , और इतना कहते कहते खुद भी फूट फूट कर रोने लगा। दोनों बड़े भाइयों ने आंखों पर काला चश्मा पहन लिया।
दुनिया को वो भले स्टाइल लगे पर सच कुछ और ही था। डरते थे कि उनके आंसू कोई देख न ले।
दिल जोर जोर से धड़क रहा था उसका, चारों तरफ नजर घुमा कर देखा । पूरा घर तो वहीं था पर पापा नहीं दिखे।
सबसे पूछा उसने पापा कहां है , सब ने कहा आ रहे हैं कहीं व्यस्त होंगे ।
इतने में ससुराल वाले लोगों ने कहना शुरू कर दिया। "विदाई का मुहूर्त निकला जा रहा है।"
वो अपने साजन के साथ बस में बैठ गई , पर खिड़की से नजर बाहर ही थी , पापा अब भी न दिखाई दिए ।
बस चल पड़ी , एक एक करके आंखो के आगे से भाई, बहन , चाचा, चाची, ताऊ जी, ताई जी, मम्मी, सब छूट ते चले गए।
धीरे धीरे सब दृश्य धूमिल हो गए पर पापा अब भी नहीं दिखे।
दूरकहींगानेकीआवाजआरहीथी" बाबुलमोरानैहरछूटोहीजाए।"
By Nirupama Bissa

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