विडम्बना
By Manisha Nirmal Badale
रीति ऑफ़िस जाने के लिए तैयार थी और डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करने ही बैठ रही थी कि उसके कानों में उसकी माँ कांता देवी की आवाज़ पड़ी। पाँच सेकंड की बात सुनकर ही रीति समझ गई कि आज फ़िर उसकी माँ अपनी बहन से अपना दुःख कह रही है। उसने हताशा में सर झटका और अपना बैग उठाकर दरवाज़े की ओर बढ़ गई। पीछे से उसकी भाभी शशि ने आवाज़ देकर कहा, "दीदी, नाश्ता?" रीति ने कहा, "इच्छा नहीं है शशि।" और उसने दरवाज़ा खोल दिया। बाहर जाते-जाते भी उसके कानों में भाभी के शब्द पड़े जो शायद उसे सुनाने के लिए ही कहे गए थे। वह बड़बड़ा रही थी, "नहीं खाना था नाश्ता तो पहले बोलना चाहिए था ना। सुबह-सुबह उठकर इनके लिए नाश्ता बनाओ और महारानी जी मुँह पर मना करके निकल जाती हैं।"
रीति चाहती तो रूककर जवाब दे सकती थी कि यह नाश्ता उसके कमाए पैसों से बनता है और जिस घर की मालकिन बनकर इतने ठाठ से मुंबई जैसे शहर में रह रही है, वह रीति की कमाई से ही बना है। लेकिन जब अपनी माँ ही अपनी नहीं रही तो भाभी तो फ़िर पराये घर की बेटी है। यही सोचकर वह फीकी मुस्कान होंठों पर लिए वहाँ से निकल गई।
रीति के लिए यह नया नहीं था। पिछले आठ सालों से वह यह सब सुनती आई थी। रीति चार्टर्ड अकाउंटेंट थी और एक बहुत अच्छी कंपनी में काम करती थी। उसने कुछ ही सालों की नौकरी में पैसे इकट्ठे करके और कुछ लोन लेकर मुंबई शहर में दो बैडरूम का खुद का घर ले लिया था जहाँ वह अपने तथाकथित परिवार के साथ रहती थी। तथाकथित इसलिए क्योंकि कहने को तो उसके परिवार में उसकी माँ, उसका छोटा भाई, भाभी और उनके दो बच्चे थे मगर केवल वे ही उसका परिवार थे। उनके परिवार में रीति कहीं नहीं आती थी। एक पिता थे जो उसके साथ थे लेकिन कोरोना ने उन्हें भी उससे दूर कर दिया था। अब वह अपनी माँ के साथ उनके कमरे में रहती थी। कैसी विडम्बना थी ना कि जिसका यह पूरा घर था, उसके नाम का एक कोना भी नहीं था घर में।
आप सोच रहे होंगे कि सबकुछ इतना अच्छा होने के बाद रीति की ज़िन्दगी में ऐसा क्या था जिसकी वजह से वह परिवार से ऐसा व्यवहार पाती थी तो इसका उत्तर है कि उसकी उम्र अड़तीस की हो गई थी मगर उसकी शादी नहीं हुई थी। और, शादी न होने का कारण बहुत बड़ा था। वह काली थी और उसकी आवाज़ थोड़ी भारी थी। ये कारण कि वह चार्टर्ड अकाउंटेंट थी, खुद का घर खरीद चुकी थी, पूरे परिवार का पालन-पोषण करती थी और शरीर से एकदम फिट, एथलीट बॉडी वाली लड़की थी, काफ़ी नहीं थे उसे अपने परिवार से प्यार दिलाने के लिए लेकिन क्योंकि उसकी "कुरूपता" उसकी शादी में बाधक थी इसलिए उसके साथ ऐसा व्यवहार होता था।
उसकी माँ दिन-रात कभी अपनी तो कभी अपने पति की बहनों के सामने अपना दुःख रोती रहती थीं। रीति पक चुकी थी अपनी माँ की बातें सुन सुनकर। आज भी वे अपनी ननद से फ़ोन पर बात कर रहे थीं, "इसकी शादी हो जाये तो मैं तो गंगा नहा लूँ, इसका घर बस जाए तो मुझे तो चार-धाम करने की भी आस न रहे, ये सेटल हो जाए तो मैं चैन से मर सकूँ। आखिर कबतक अपने भाई पर बोझ बनकर रहेगी यह जीजी?"
इतना सुनते ही रीति अपना आपा खो बैठी और उठकर उनके पास आई। वह गुस्से-से बोली, "माँ, मैं बोझ हूँ अविनाश पर? मैं? इस घर को अपनी कमाई से मैं चलाती हूँ। आपका लाल तो पहले ही इतना कम कमाता है कि अपने दोनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी मेरे बिना नहीं उठा सकता है। आधी पगार तो बीवी के पाउडर क्रीम में खर्च कर देता है वह। पिछले साल कुहू को स्कूल ट्रिप पर नॉर्थ ईस्ट लेकर गए थे तो उसकी पिकनिक की फीस पंद्रह हज़ार रूपए और उसके नए लैपटॉप के लिए चालीस हज़ार रूपए मैंने अपनी एफडी तोड़कर भरे थे, ऊपर से आप यह कह रही हैं कि मैं बोझ हूँ उसपर?"
माँ ने तो फ़ोन पहले ही काट दिया था। वे नहीं चाहती थीं कि उनके घर की बातें उनकी ननद फ़ोन पर सुने। इतना सुनते ही शशि त्यौरियाँ चढ़ाकर आई और बोली, "तो आपको क्या दिक्कत है दीदी? अपने पति की कमाई से पाउडर क्रीम खरीदती हूँ मैं। आपको क्या परेशानी है? कहीं आप मुझसे जलती तो नहीं हैं ना क्योंकि आपके पास तो पति है नहीं!"
रीति मुस्कुराकर बोली, "जलती तो मैं तब शशि जब तुम्हारा पति तुमपर पैसे खर्च करने के बाद यह घर संभाल पाता। जब वह अपने पैसे ख़त्म होने के बाद मेरे सामने हाथ फ़ैलाने आ जाता है तो मैं उससे किस बात से जलूँ? जितनी चादर हो ना शशि, पैर उतने ही फ़ैलाने चाहिए। दूसरों की चादर की उम्मीद में पैर नहीं फैलाते। समझीं?"
यह सुनकर शशि जलभुन गई और तुनककर अपने कमरे में जाकर कमरा अंदर से बंद करके बैठ गई। कांता देवी ने एक गहरी साँस ली और उठकर रसोई की ओर चल दीं। वे जानती थीं कि अब दो दिन रसोई उन्हें ही संभालनी होगी क्योंकि बहुरानी का गुस्सा ख़त्म होने में उतना समय और एक नई साड़ी दोनों लगेंगे और बेटी ने तो कभी घर का काम सीखा ही नहीं। जब वे उसे सिखाना चाहती थीं तब वह पढ़ाई में व्यस्त रहती थी और एक बार व्यंगात्मक मुस्कान के साथ उसने कह भी दिया था कि माँ आपने कहा था कि घर का काम सीख लो ससुराल में करना होगा लेकिन कल तो आप मौसी से कह रही थीं कि इस लड़की की शादी शायद कभी नहीं होगी इसके रूप-रंग और ऊपर से इस भारी आवाज़ के कारण। तो जब मेरा कोई ससुराल होगा ही नहीं तो मुझे काम करना ही नहीं पड़ेगा इसलिए मुझसे सीखना ही नहीं है।
माँ के दुःख रोने और भाभी के तेवर होने के बाद भी रीति अपने परिवार पर जान छिड़कती थी। भाई को उससे तब तक मतलब नहीं होता था जब तक उसे पैसों की ज़रूरत नहीं होती थी। जब पैसे चाहिए होते थे तब ही वह बहन के पास जाकर दो बातें करता था या यूँ कहना चाहिए कि अपनी मजबूरियाँ और परेशानियाँ गिनाता था। रीति सब जानते हुए भी उसे पैसे दे देती थी। आखिर इंसान अपने परिवार के लिए ही कमाता है और ले देकर यही तो परिवार था रीति का।
पिछले दिनों रीति के ऑफिस में एक नई लड़की ने ज्वाइन किया था। वह एक फ्रेशर थी और रीति के अंडर ही काम कर रही थी। उसका नाम छवि था। छवि एक बहुत ही मस्तमौला और खुश रहने वाली लड़की थी। वह सीखती भी बहुत जल्दी थी और उसके अंदर लोगों के पहचानने और समझने का गुण भी बहुत अच्छा था। वह कुछ ही दिनों में यह समझ गई थी कि रीति स्वभाव से बहुत अच्छी है और काम में बहुत होशियार। वह रीति से बहुत कुछ सीखना चाहती थी।
रीति बहुत कोशिश करती थी कि वह घर में सबके साथ प्यार से रहे लेकिन जब बातें सर से ऊपर चली जाती थीं तो वह भी खुद को संभाल नहीं पाती थी। उसे फोटोग्राफी का बहुत शौक था। वह पक्षियों और जंगली जानवरों की फोटो खींचकर बहुत सुकून पाती थी। जंगलों में घंटो जानवर का इंतज़ार करना या किसी पक्षी के घौंसले के नीचे डेरा डालकर उसकी किन्हीं हरकतों का इंतज़ार करना और फिर उन्हें अपने कैमरे में कैद कर लेना उसका पसंदीदा काम था। कैमरे से ज़्यादा महंगे उसके लेंस आते हैं। ये तो हज़ारों से शुरू होकर कई लाख रुपयों तक भी होते हैं।
रीति के भाई-भाभी को उसका यूँ कोई लेंस लेना और फोटोग्राफी के लिए जाना फ़िज़ूलखर्च लगता था। उनका कहना था कि एक ही पक्षी के अलग-अलग फोटो लेकर क्या ख़ुशी मिलती है? लेकिन वह ख़ुशी तो वही महसूस कर सकता है जो उनके करीब रहा हो। आए दिन घर में इस बात को लेकर बहसबाज़ी होती थी मगर कांता जी उन लोगों को संभाल लेती थीं।
इस बार रीति ने फोटोग्राफी का एक लम्बा टूर बनाया था। करीब आठ दिनों के इस टूर के लिए वह बहुत उत्साहित थी। हर बार की तरह घर में झगड़ा क्लेश तो हुआ मगर रीति आखिर चली ही गई। वह एक हफ़्ता उसके लिए बहुत अच्छा गुज़रा था। उसने बहुत ही सुन्दर फोटो खींचे थे और अपने नए बने दोस्तों के कहने पर उन्हें एक प्रतियोगिता में भी भेज दिए थे। पर जैसे ही वह घर आई, उसे एक-एक करके कई शॉक्स मिले।
पहले तो घर का दरवाज़ा खोलते समय उसकी नज़र ऊपर नेमप्लेट पर गई तो वह हैरान रह गई। वहाँ एक नई नेमप्लेट लगी थी जिसपर केवल उसके भाई और भाभी का नाम था। हालाँकि यह घर रीति ने खरीदा था तो बिल्डर ने घर पर उसके नाम की नेमप्लेट लगाकर दी थी लेकिन रीति सबको साथ लेकर चलती थी इसलिए उसने खुद ने एक नई नेमप्लेट बनवाई जिसपर उसके माता-पिता का, उसके भाई-भाभी का और अंत में उसका नाम लिखा था लेकिन आज घर की मालकिन का ही नाम घर की नेमप्लेट से गायब था।
वह भाई से इस बारे में बात करने का सोचते हुए अंदर आई तो एक और शॉक उसका इंतज़ार कर रहा था। हॉल के सोफ़े बदले जा चुके थे। अच्छे हल्के भूरे रंग के सोफों की जगह गहरे गुलाबी रंग के सोफे वहाँ खड़े रीति को मुँह चिढ़ा रहे थे। उसने पहले ही अविनाश से कहा था कि उनके घर का हॉल छोटा है तो हल्के रंग के सोफों से वह थोड़ा बड़ा तो दिखता है लेकिन उसकी भाभी को गुलाबी रंग का सोफा चाहिए था और अंततः उन्होंने ले ही लिया था। रीति ने अपना सर झटक दिया और कमरे की ओर बढ़ गई।
कमरे में गई तो एक बहुत बड़ा शॉक उसका इंतज़ार कर रहा था। कमरे में कदम रखते ही उसका सर चकरा गया। वह हैरानी से चारों ओर देखने लगी। उसकी माँ का कमरा अब उसके भाई-भाभी का हो चुका था। अब उसके सब्र ने जवाब दे दिया था। वह ज़ोर से चिल्लाई, "अविनाश, शशि।" सबसे पहले कांता जी उसके पास आईं और उसका हाथ पकड़कर उसे अंदर ले जाने लगीं। वे बोलीं, "मेरी बात सुन रीति..." लेकिन रीति को कुछ नहीं सुनना था उसे सिर्फ अपने सवालों के जवाब चाहिए थे।
उसने एक और बार अपने भाई और भाभी को आवाज़ दी तो वे लोग रसोई से बाहर निकलकर आये। रीति ने गुस्से-से कहा, "जब मैंने कहा था कि यह कमरा माँ के लिए रहने देना तो तुम लोगों ने कमरा क्यों बदला? और वो भी मेरे पीछे से?" अविनाश चुप खड़ा था लेकिन शशि पीछे से निकलकर सामने आई और बोली, "आपने कहा था का क्या मतलब है दीदी? आपका राज़ चलेगा अब इस घर पर? अरे, बहू हूँ मैं इस घर की। मुझे बाथरूम वाला कमरा देना चाहिए था ना इन्हें पहले से? लेकिन दिया क्या मुझे? वो आठ बाई दस का छोटा-सा कमरा? बस इसलिए बदल लिया।"
रीति ने कहा, "लेकिन शशि तुम्हें अच्छी तरह से पता है कि माँ को रात में कितनी बार बाथरूम जाना पड़ता है। कमरे में ही वॉशरूम हो तो माँ आसानी से जा सकती हैं। रात के अँधेरे में बाहर निकलीं और कहीं पैर अटकने से गिर वगैरह गईं तो कितना मुश्किल होगा, कभी सोचा है तुमने?" अब अविनाश भड़क गया और बोला, "हाँ, सबकुछ सोचना तो हमारा काम है। और आपको कुछ भी सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है। आप तो बस अपने मन से घूमने-भटकने निकल जाती हो और पीछे हम सबकुछ संभालते हैं। माँ को भी संभालो, घर को भी देखो।"
रीति गुस्से-से बोली, "माँ को? माँ को क्या संभालना होता है? उल्टा माँ ही सब संभालती है। जब तेरी बीवी दो-दो दिन मुँह फुलाकर बैठ जाती है तब माँ ही पूरा घर संभालती हैं।" अब शशि ने अपना मुँह खोला और ज़हर उगला। वह बोली, "हाँ संभालना तो पड़ेगा ही ना। आखिर बेटी अपनी रंगरलियों में इतनी व्यस्त जो होती है। अभी भी आठ-आठ दिन अकेली चली गई थीं आप। ग्रुप में और तो लड़के ही होंगे ना? पता नहीं किस किसके साथ मुँह काला करके आई हैं अब।"
इतना सुनते ही रीति का हाथ उठ गया और उसने शशि को एक थप्पड़ मार दिया। कांता जी सब देख सुन रही थीं लेकिन चुप थीं। उन्होंने एक बार भी नहीं कहा कि मेरी बेटी से ऐसी गलत बात मत बोलो, वह ऐसा कुछ नहीं कर सकती। शशि बुरी तरह रोने लगी थी। यह तो अच्छा था कि बच्चे स्कूल गए हुए थे वरना उन्हें यह तमाशा देखना पड़ता। अविनाश गुस्से-से बोला, "यह क्या किया आपने दीदी? क्यों शशि पर हाथ उठाया?"
रीति हैरानी से उसे देखते हुए बोली, "मैंने हाथ उठाया वह दिख गया तुझे लेकिन उसने मुझे क्या कहा यह नहीं सुना तूने? तूने उसे तो नहीं कहा कि मेरी बहन के बारे में ऐसी घटिया बातें मत करो।" अविनाश बोला, "तो क्या गलत कहा उसने? आपने हरकत ही ऐसी की थी। इतने दिनों तक इतने आदमियों के साथ रहना, कोई क्या मतलब निकाले और इस बात का?"
अब रीति रो पड़ी थी। जब अपनी माँ और भाई ने ही साथ नहीं दिया तो भाभी से क्या उम्मीद करती। वह रोते हुए बोली, "वाह अविनाश, बस इतना ही विश्वास है तुझे अपनी बहन पर?" अविनाश घृणा से बोला, "आपकी शादी नहीं हुई है लेकिन ज़रूरतें तो सबकी होती हैं ना दीदी। तो आपने गलत काम नहीं किया है, इस बात पर कैसे विश्वास कर लूँ मैं?" रीति के आँसू एकदम से बंद हो गए थे और अब उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे। कांता जी अपना मुँह ढककर रो रही थीं।
रीति गुस्से-से बोली, "शर्म नहीं आई अपनी बड़ी बहन से ऐसी घटिया बात करते हुए? एक काम कर अविनाश, यह घर खाली कर दे और चला जा अपने घर या कोई घर किराये पर ले ले। अब तू यहाँ नहीं रह सकता। यह घर मेरा है, मैंने इसे अपनी मेहनत से खरीदा है। यहाँ की हर चीज़, यहाँ तक कि हॉल में रखे वो गुलाबी सोफ़े भी मेरी कमाई के हैं। तो तू चला जा यहाँ से। अपने परिवार को लेकर।"
अब कांता जी बोलीं, "क्यों चला जायेगा यह यहाँ से? यह घर इसका है। इसपर इसका पूरा हक़ है। इसके माँ-बाप इस घर में रहे हैं तो इस घर पर मेरे बेटे का पूरा हक़ है। किसी को जाना ही है तो वो तू चली जा। चली जा हमारी ज़िन्दगी से तो कलंक तो हटे हमपर से कम से कम।" अपनी माँ के मुँह से ऐसे कड़वे बोल सुनकर रीति से अब खड़ा नहीं रहा गया और वह जैसी आई थी, वैसी की वैसी अपना वही बैग उठाकर बाहर चली गई।
अपने दोनों बैग हाथ में लेकर वह सड़क पर चली जा रही थी। आज अपना ही शहर उसे अनजाना लग रहा था। भाई-भाभी के शब्द उसके कानों में पिघले सीसे जैसे पड़ रहे थे। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। जैसे-तैसे वह एक होटल के पास पहुँची और अपने लिए एक कमरा बुक करके अंदर चली गई। कमरा बंद करके वह बेड पर निढाल गिर गई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। न जाने कितने घंटे वह रोती रही कि थकान से उसकी नींद लग गई।
कई दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। रीति दिन-रात रोती रहती। खाना कभी इच्छा हुई तो मंगवाती और उसमें भी आधे समय बिना खाए छोड़ देती। आज पाँच दिन हो गए थे लेकिन न तो अविनाश और शशि का और न ही उसकी माँ का एक भी फ़ोन आया। हाँ, छवि के कई फ़ोन आये थे लेकिन उसने एक भी नहीं उठाया। शायद उसके मैसेज भी आये थे क्योंकि बार-बार फ़ोन पर मैसेज टोन बज रही थी।
आखिरकार छठवें दिन वह कमरे से बाहर निकली और उसने होटल के बाहर पैर रखा। इन छह दिनों में उसका हाल ख़राब हो गया था। वज़न एकदम से गिर गया था और चेहरा पीला पड़ गया था। आँखें गड्ढे में घुस गई थीं जिन्हें उसने गॉगल पहनकर छिपा लिया था। वह बिना लक्ष्य के सड़क पर पैदल चली जा रही थी कि अचानक किसी से टकरा गई। सामने वाली लड़की और रीति दोनों ही गिर गए। वह लड़की झट से उठी और रीति को उठाते हुए बोली, "सॉरी वो मेरा ध्यान..."
सामने रीति को देखकर छवि चिल्ला उठी, "मैम, आप यहाँ? आप तो बाहर गई थीं ना किसी बीमारी के इलाज के लिए? जब आपने इतनी बार मेरा फ़ोन नहीं उठाया तो मुझे और सर को आपकी बहुत चिंता हुई और इसीलिए एक दिन सर ने आपके घर फ़ोन किया आपके भाई को। उन्होंने बताया कि आपको कोई बड़ी बीमारी हो गई है जिसके चलते आप इलाज करवाने बाहर गई हैं और आपको आने में कुछ महीने लग जायेंगे। वह तो सर आपके काम से बहुत खुश थे इसलिए उन्होंने एचआर को सब सँभालने के लिए कह दिया वरना ऐसे बिना बताये लम्बी छुट्टी जाने पर तो कंपनी एक्शन लेती है।"
छवि लगातार बोले जा रही थी और रीति इस एक नए शॉक को झेल रही थी कि अचानक छवि का ध्यान रीति की आँखों पर गया। नीचे गिरने के कारण रीति का गॉगल ज़मीन पर गिरकर टूट गया था तो छवि को उसकी आँखें दिखाई दीं। वह उसकी पीली-लाल आँखें देखकर हैरान हो गई और बोली, "मैम, आपकी तबियत तो सच में ठीक नहीं है।" यह सुनकर रीति से रहा नहीं गया और वह छवि के गले से लगकर ज़ोर से रो उठी।
छवि बुरी तरह घबरा गई थी। उसने जैसे-तैसे रीति को संभाला और ऑटो में बैठकर अपने घर ले आई। छवि के माता-पिता बहुत सुलझे हुए अच्छे लोग थे। छवि ने उन्हें रीति के बारे में काफ़ी कुछ बताया था कि वह कितनी होशियार है, काम में अच्छी है, स्वभाव से सौम्य है और फोटोग्राफी भी बहुत अच्छी करती है। छवि उसे लेकर सीधे अपने कमरे में गई और उसे संभाला।
छवि की माँ भी पीछे आई और वे भी रीति की ये हालत देखकर परेशान हो गईं। उन्होंने रीति से कहा, "बेटा, आप बाथरूम में जाकर फ्रेश हो जाओ फ़िर हम बात करते हैं।" रीति उन्हें एकटक देख रही थी तो छवि उसे लेकर धीरे-धीरे बाथरूम की ओर चली गई। कुछ देर बाद जब वह बाहर आई तो छवि की माँ कोमल जी ने उसे बहुत प्यार से खाना खिलाया। रह रहकर रीति की आँखें छलक जाती थीं लेकिन इतने दिनों बाद उसने पेट भरकर और शायद बहुत सालों बाद उसने मन भरकर खाना खाया था। फ़िर उसने धीरे-धीरे कोमल जी को कुछ बातें बताईं कि वह घर छोड़कर क्यों निकली थी।
शाम को छवि के पिता के घर आने के बाद कोमल जी ने उन्हें सब बातें बताईं जो रीति ने उन्हें बताई थीं। साथ ही उन्होंने बताया कि रीति की मानसिक हालत ठीक नहीं है। छवि के पिता ने शहर के एक बहुत जाने-माने साइकोलॉजिस्ट का अपॉइंटमेंट लिया और कोमल जी को उसे वहाँ ले जाने के लिए कहा। अगले दिन छवि कोमल जी के पास रीति को छोड़कर ऑफिस के लिए निकल गई और उसने अपने बॉस को सब बातें बताईं। उन्हें भी रीति के परिवार पर बहुत गुस्सा आया।
कोमल जी अगले दिन से रीति को साइकोलॉजिस्ट के पास ले जाने लगीं। कुछ ही सेशन के बाद उन्होंने रीति का मन खुलवाकर रख दिया। रीति ने उन्हें सब बताया जो उसने अपने काले रंग और भारी आवाज़ के कारण सहा था। धीरे-धीरे कुछ सेशन और होने के बाद रीति काफ़ी अच्छी हो गई थी। आज एक महीना पूरा हो गया था लेकिन रीति के घर से एक भी फ़ोन नहीं आया था। शायद उन्होंने उसे मरा हुआ ही मान लिया था या फ़िर उन्हें यह जानने की कोई इच्छा नहीं थी कि वह कहाँ है, कैसी है!
आज बहुत बड़ा दिन था। आज रविवार था यानि अविनाश भी घर पर था। रीति अपने घर गई। कोमल जी भी ज़िद करके उसके साथ गईं। घर के बाहर पहुँचकर उसने अपने पर्स से घर की चाबी निकाली लेकिन फ़िर वापिस डाल दी। अनायास ही उसके हाथ घंटी पर चले गए। उसने घंटी दबा दी। कुछ समय बाद दरवाज़ा खुला तो सामने खड़ी शशि की आँखें उसे देखते ही बड़ी-बड़ी हो गईं।
उसने ज़ोर से अविनाश को आवाज़ दी और बोली, "अरे देखो तो कौन आया है। दीदी वापिस आ गई हैं।" अविनाश दौड़कर बाहर आया और उसके पीछे कांता जी भी धीरे-धीरे चलती हुई आईं। वे बहुत ज़ोर-से खाँस रही थीं। रीति देखते ही समझ गई थी कि उनकी अस्थमा की दवा ख़त्म हो गई है और किसी ने उन्हें दवा लाकर भी नहीं दी है।
रीति माँ को देख ही रही थी कि उसके कानों में शशि की आवाज़ आई। वह अविनाश से बोल रही थी, "देखो दीदी वापिस आ गई हैं। अब हमें कोई भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। बच्चों की स्कूल फीस भी जमा हो जाएगी और मम्मीजी की दवा भी आ जाएगी।" रीति ने नफ़रत से शशि की ओर देखा और फ़िर अपने बैग से एक बड़ा थैला लेकर कांता जी की ओर बढ़ी।
उसने वह थैला आगे किया तो कांता जी ने उसे थाम लिया। रीति सपाट शब्दों में बोली, "इसमें आपकी छह महीने की सारी दवाइयाँ हैं।" फ़िर वह अविनाश की ओर मुड़ी और उससे बोली, "बच्चों की इस सेशन की पूरी फीस मैंने जमा करवा दी है और इस महीने तक के सभी बिल भी जमा करवा दिए हैं।" यह कहकर उसने पर्स में हाथ डाला और कुछ कागज़ और घर की चाबी हाथों में लेकर हाथ अविनाश की ओर बढ़ा दिया। वह सामान उसके हाथ में देते हुए रीति बोली, "ये इस घर के कागज़ात हैं। मैंने यह घर माँ के नाम करवा दिया है और उनके बाद यह तुम्हें मिल जायेगा। ये रही घर की वे चाबियाँ जो मेरे पास थीं। आज के बाद इस घर से और इस घर के लोगों से मेरा कोई लेना देना नहीं है। आप लोगों को अपनी ज़िन्दगी मुबारक और मैं अपनी जी लूँगी। मैंने मेरा बेटी होने का और बड़ी बहन होने का हर फ़र्ज़ निभा दिया है। अब मुझपर मेरे माता-पिता का कोई ऋण शेष नहीं है।"
यह कहकर वह मुड़ी और नम आँखों और लड़खड़ाते पैरों के साथ जाने के लिए मुड़ गई। कोमल जी ने उसे थाम लिया था। पीछे कांता जी की आँखों में आँसू थे और अविनाश और शशि की आँखों में हैरानी। उन्हें एक महीने में ही समझ आ गया था कि रीति के बिना उनकी गृहस्थी चलना कितना मुश्किल है। वहीं रीति अपने सारे ग़म और अपमान वहीं छोड़कर हल्के मन से आगे बढ़ चुकी थी किराये के एक छोटे-से मकान में अपनी नई ज़िन्दगी शुरू करने।
By Manisha Nirmal Badale

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