विडम्बना
By Rashmi Abhay
सोचती हूँ अक्सर... ये कैसी विडम्बना है जीवन की तुम्हारा मुझे भूल जाना और मेरा चुपचाप अपने मन की अंधेरी कोठरी में पड़े रहना... कुछ विचित्र सा लगता है तुम्हारा मेरे जीवन में यूँ शामिल रहना...
तुम्हारा होकर भी मेरे ना होने का वजूद रखना... सबकुछ सुन कर भी मुझे अनसुना कर देना है ना कुछ अप्रत्याशित सा ये सबकुछ... सुनो ना... बहुत कोशिश करती हूंँ मैं भी...सब कुछ भूल कर फिर से उठना ठहरे हुए समय को गति देना... अपने लिए एक नई राह चुनना...और फिर उस राह में चलते रहना और बस चलते रहना।।
By Rashmi Abhay

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