विचार भटकते हैं
By Aditya Nandkumar Garde
विचार पिंजरों से निकलकर भटकते हैं,
सलाखें टूट जाए, तो मंजर भटकते हैं।
खुदा बनाकर जिन्हें सजदे में रख दिया,
हकीकत सामने आए, तो पुतले भटकते हैं।
अंधेरों में छुपकर जो खामोशियाँ रही,
विचार जागे, तो वही अलाप से भटकते हैं।
हुकूमतों के तख्त, जमीनों पे टिक ना पाए,
जब भी सवाल उठे, तो ताजो-तख्ते भटकते हैं।
खामोशियों के होंठ पें सीलें लगी रही,
विचार छू लें, तो वही नगमें भटकते हैं।
कलम की धार ने ही सदियों को मोड़ दिया,
तलवारों के साये भी, फिर डर से भटकते हैं।
जहाँ पे रात ने ही उजाले को कैद किया,
सितारे जाग जाए, तो अंधियारे भटकते हैं।
नदी के रास्ते रोकने की चाल चली,
बवंडर छू लें, तो वही बाँध भटकते हैं।
जो सच दबा दिया था हवाओं की ओंट में,
विचार बोल पड़े, तो वही परदें भटकते हैं।
आदि की सोच आईना बनकर दिखा रही,
जमाने भर के चेहरे, खुद आईने से भटकते हैं।
By Aditya Nandkumar Garde

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