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विघ्नों का कारक

By Aditya Nandkumar Garde


आज में देवी की आरती को गया था, 

पर सवालों में ही अटक सा गया। 

वाक्य था ये की उसमें ही भटक गया, 

“वारुणिया देवा रक्षावे दीना”। 


जब जाके मन में सवाल आया,

इस वाक्य में विघ्न का कारक कौन है?

पेड़ काटे, नदी का भी गला घोंट दिया,

फिर भी मंदिर में दीप जला गया। 


जानवरों की सभी दुनिया उजाड़ी उसने,

फिर भी खुद को इंसान कह गया। 

जहर उसने ही हवा में घोला है,

फिर दोष बदलकर हवाओं पे गया।



धरती की छाती से सोना नोच लिया,

नाम विकास का था, असल में विनाश कर गया। 

मासूम पंछी भी चुप हो गए,

जब इंसान पिंजरे का बाजार बना गया। 


मैंने बहुत  विचार किया सभी दुनिया के विघ्नों पे,

इंसान के अलावा कोई और नजर न आया। 

ना कोई दानव, ना कोई असुर था,

इंसान ही खुद विघ्नों का कारक दिखा गया। 


By Aditya Nandkumar Garde


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