वासना के मेघ
By Mayank Singh
वासना के मेघ के पीछे छिपी है चेतना
सम्मान का भी स्थान अब पा चुकी है वेदना।
भूलने लगे हैं नेत्र मनुष्य के स्वरूप को
अस्तित्व का आधार अब कर दिया है रूप को।।
काम की ज्वाला में, तपता मन अधीर है
मानवता न दिख रही, दिख रहे बस शरीर हैं।
आहत हुई हैं भावनाएँ, शब्द रूपी तीर से
कामाग्नि क्षीण होती, विवेक रूपी नीर से।।
मर्यादाएं नष्ट करता काम का आवेश है
पशुता को पुष्ट करता इंद्रीय आदेश है।
यातनाएं आरोपित होती हैं अनेकों प्रकार से
मूढ़ करते आंकलन देह के आकार से।।
क्या नवीनता के शिखर पर यह हमारा कृत्य होगा?
नवयुग के निर्माण का यह सामाजिक दृश्य होगा?
प्रश्न चिन्हों ने घेर लिया, नहीं कोई उत्तर विशेष
विफलताएँ सिद्ध हुईं, याचना है अंतिम विकल्प शेष।।
By Mayank Singh

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