वर्षा में भीगती दिनचर्या
By Anant Srivastav
आज सुबह नींद खुली
आँखों में कुछ शेष स्वप्न थे,
कुछ थी देह में आलस्य की परछाईं,
और कुछ अकड़न —
मानो रात की थकान
अब भी पसरी हो रग-रग में।
मौसम बाहर
कविता बनकर बरस रहा था,
कमरे की खिड़की से देखा —
धरती और अम्बर के मधुर मिलन को
जहाँ धरा नहा रही थी अम्बर के नेत्रों से,
बारिश की रिमझिम —
जैसे प्रकृति की प्रेम-की अभिव्यक्ति।
पर भीतर...
वहीं वही जीवन की जंजीरें,
वही मशीनों का अनुबंध,
वही गुलामी का दायित्व
जिसे ‘नौकरी’ कहते हैं लोग
और जरूरी समझते हैं जीवन जीने के लिए।
इस ऋतु के सौंदर्य में
कुछ भी "सौंदर्य" नहीं था मेरे लिए,
क्योंकि जाना था दफ़्तर —
जहाँ आत्मा सिकुड़ जाती है
समय की समय-सीमा में,
और हृदय हो जाता है
पंचांग के पन्नों-सा जड़।
घर से निकला
तो सड़कें
मानो अपने ही दुःख को पीकर
ऊफन रही थीं,
हर ओर जल-जमाव का अराजक संगीत —
व्यवस्था की विफल कविता सा प्रतीत हो रहा था।
भीगता रहा मैं —
बारिश से भी, और
उस ‘अवश्यम्भावी’ दिनचर्या से भी
जिसे हमने स्वयं बनाया है
"कल के सुकून" के नाम पर।
घर,
जहाँ दीवारें भी अब चुप हैं,
और राहें —
जहाँ हर क़दम
एक प्रश्न है भविष्य पर।
फिर भी...
जाना है,
क्योंकि जीवन की परिभाषा में
"रुकना"
अब विकल्प नहीं रहा
क्योंकि यहाँ सिर्फ तय है
चलते रहना
और इसी में छुपा है
"जीवन" का सारा अर्थ...।
हम सब चल रहे हैं —
बिना रूमानियत के,
बिना शिकायत के,
बस चलते जा रहे हैं...
मानो बारिश नहीं हो रही,
बल्कि मनुष्यत्व भीग रहा है —
धीरे-धीरे,
चुपचाप...
बिना किसी छतरी के।
By Anant Srivastav

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