वर्षा ऋतु
By Mrinalini Gajbe
धर-तल छूती,
वर्षा बूंदे।
करती नृत्य
घुँघरू बांधे ।।
छम-छम , छम -छम,
मधुर ताल।
संगीतमय हो
प्रकृति आव्हान ।।
घुमड़-घुमड़ मेघ,
देते थाप
ताल-ताल नृत्य,
अदभुत मिलाप ।।
कुहू-कुहू कोयल,
गाये मल्हार।
फुदक-फुदक मोर
नाचे अपार।।
हरी-हरी पत्तों,
बैठी ओस।
चम-चम चमकते,
हीरे अनमोल।।
झूम-झूम शाखें ,
लगाती गले
मंद-मंद पवन
के झोंके अलबेले ।।
नई-नई कोपलें
खिलती बगिया,
महक-महक उठे
उपवन सारा।।
हरे-हरे खेत
लहराते जहाँ
खिल-खिल मुस्कुराते
किसान वहाँ।।
सतरंगी इंद्रधनुष
क्षितिज विराजे
सोंधी-सोंधी मिटटी
सुगंध भाए ।।
उथल-पुथल मन
भीतर स्पंदन
तक-तक नयन
बुनते स्वपन
कल-कल नदिया
निर्झरणी धार
नट-खत बाल
खेलते मजधार।।
घन-घन श्यामल
तिमिर तन
भीग-भीग विस्मृत
पुलकित उपव। ।
जन-मन बैर
मिटाये कण
वर्षा ऋतू लायी
उन्मुक्त जीवन।।
By Mrinalini Gajbe

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