वजूद की तलाश
By Sobia Rashid
जज़्बात ही थे - ज़िंदगी का ख़ासारा हो गये,
कुछ उम्मीदों के तराने हमारे हो गये|
मुट्ठी में लिए पल-भर की खुशियाँ,
अब ख्वाब सब अजनबी हो गये|
जिनको चाहा हमने, सब अपने ही बेगाने हो गये,
वो बातें, वो यादें - चन्द लम्हो के फ़साने हो गये|
झिलमिलती भीड़ में हम बेसहारा हो गये,
अपनी ही परछाई से हम अंजान हो गये|
अगर मिले तो वजूद ढूंढ रहे हैं हम,
किसी को देकर पराए हो गये हैं हम|
गूंजने हैं लगते वो लम्हे ज़हेन में,
अब खामोशियों के मंज़र भी चीखों में बदल गये;
कुछ ज़िंदगी के पहलू इस तरहा से पलट गये|
कभी हूँ खुद से ही अंजान तो,
कभी वाकिफ़ हूँ तर्क-ए-ताल्लुक़ात से|
ना है कोई रास्ता, ना है सहारा,
खुद ही से बे-ताल्लुक़ात हो गये - बनकर एक फ़साना|
By Sobia Rashid

Love it
❤️
🙌🏻
मुुद्दतो बाद प्यार मिले तो उस इंतजार का अलग एक सुकून है
Beautiful.