वक़्त
By Sanjay Kumar Upadhyay
सब कुछ आज़म के देख लिया ,
अब तो तेरे शहर आके भी देख लिया …!
ज़िंदगी अब भी वहीं ठहरी हुई है ,
वक़्त का पहिया घुमा के भी देख लिया…!
ख़्वाब जो टूटे तो फिर नहीं आते,
हर बार खुद को सुला के भी देख लिया …!
उम्मीद, कि वो बर्बाद करने आएगा मुझे,
अब तो आशियाँ जला के भी देख लिया …!
By Sanjay Kumar Upadhyay

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