लेह की भेंट
By Neha Anand
सवालों का शोर ले गई संग झोली भर, जवाबों की शांति असीमित पाई मगर। झरने, पहाड़ और नदियों के स्वर्ग में, खुद के अनोखेपन का रवि आया सतह पर। साफ हवा, ये नीला आकाश पैनी सी ठंड में पाई, सादगी की ताप। मुस्कुराहटों के इस शहर में, क्या अपना, क्या पराया? दिल खोल के बटती मोहब्बत, रत्ती भर ना मक्कारी का साया। पर्वतों के विकराल रूप के पीछे उनकी विनम्रता की कहानी। नदियों की कल कल में बिखरी, बेबाकी, जिंदादिली की रवानी।
खाईयो की गहराई ने मिलवाया मेरी शख्सियत की जड़ों से, दूसरों के प्रति दया भाव से, सादगी, संवेदना और प्रेम की छांव से। दिलाया याद की खुद को खो न देना, झूठी चमक दमक के मुखौटों में दिखावे के मकड़ जाल में। स्तूपों की शांति ने, मन के शोरगुल पर लगाम लगाई। कल होगा क्या? भविष्य की धुक धुक नफे-नुकसान के डर की भर दी खाई। लेह ने भेंट की सीख शुक्रगुजारी की, सूरज के चमकते तारो के लिए शीतल जल के बेहिसाब प्यालों के लिए सांस के हर कतरे के लिए, दिल की धड़कन; जीवंत हर पल के लिए।
By Neha Anand

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