लिख डाला मैंने
Updated: Feb 6, 2024
By Chinmay Pandey
एक शाम बड़ी रंगीन थी
कलियां हिल रही थी
किरणें ढल रही थी
ऐसी सुंदर संध्या में भी
अपनी धरती कहीं जल रही थी
उसे रात बात हुई धरती से
था श्रेष्ठ बदन,था श्रेष्ठ वदन
वह देख मुझे मुस्कुराई
तो एक पेड़ काट के पन्ना बनाया
और उसे मुस्कुराहट को
“लिख डाला मैंने!”
यह मुस्कुराहट की लिखावट दुनिया को पसंद ना आई
उन्होंने प्लास्टिक से फिर उसे सजाया
कहीं आग लगाकर खौफ बनाया
यूं खुद का ही पतन धरती को कुछ खास ना भाया
जब हो उठी उदास वो
तो एक पेड़ काट के पन्ना बनाया
और उस उदासी को भी
“लिख डाला मैंने!”
उसकी हर अदा को मैं लिखता गया
अपनी लिखावट में संजोता गया
कुछ देर बाद आंख मिला धरती से
तो मेरी रूह तलक भी काँप गया
वह दृश्य ही कुछ ऐसा था
उसे दृश्य में न कोई चिन्मय था
बस विनाश पर विनाश ही तन्मय था
उसे दृश्य को लिखना चाह तो
ना कोई पेड़ बचा, ना पन्ना था
ना नदी बची, ना झरना था
उसे मंज़र को उसे बंजर में
“लिख डाला मैंने!!”
By Chinmay Pandey

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