लाल सियाही
By Ajeet Singh
शायद तुम्हें मालूम ना हो
पर जिन दिनों तुम मुझ ख़त लिखा करते थे
मैं उनके बाद के दिनों से नावाक़िफ़ हूँ
कितने साल हैं तुम्हारे आख़री ख़त
और मेरे सब्र के बीच
पर आज भी हर सुबह
मेरे मेज़ पे रखे तुम्हारे लफ़्ज़
उसी रंग में धड़कते हैं
तुम भी तो उतने ही बेलिहाज़ हो
ख़त लिखे भी तो लाल सियाही से
ये यहीं रहेंगे अब
मेरे कमरे में क़ैद
पर लफ़्ज़ मोहताज तो नहीं
तुम किसी और को भी लिखोगे
और फिर वो भी शायद उसी वक़्त में रह jaayega
By Ajeet Singh

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