लम्हें
By Mrinalini Gajbe
पल पल लम्हें गुज़रते जाएंगे
हम हर लम्हे को तराशते रहेंगे
बंद मुट्ठी से फिसल रही रेत को
हम मुट्ठी खोल कर थाम लेंगे !
गुज़रता हर लम्हा बयां कर रहा,
किस्से कई नए – पुराने,
हम हर किस्से को समेटते जाएंगे,
कलम डूबो कर नीली स्याही में
किताब के पन्नों पर लिखते जायेंगे !
लंबी – लंबी उड़ाने भरते ये लम्हें,
नदियों पार ,पहाड़ों के पीछे से
न जाने कितने अनकही, अनसुनी
दास्तानें लाएं हैं सुनाने !
कुछ मोहब्बत भरी, तो कुछ नफरतों की,
कुछ मासूमियत की, तो कुछ हैवानियत की
हर लम्हा अपने आप में समाए हुए,
बुन रहा इतिहास आने वाले कल के लिए !
कर्जदार हैं हम, हर गुजरते लम्हे के,
कायनात के रोहानी वजूद के,
वक्त के न कभी थमने के,
ज़िंदगी के चलते रहने के !!
पल पल लम्हें गुज़रते जाएंगे
हम हर लम्हे को तराशते रहेगें!
By Mrinalini Gajbe

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