लड़कियों नहीं, बच्चियों
By Dr. Madhulika Lakra
लड़कियों,
नहीं, लड़कियों नहीं बच्चियों
जब तुम थोड़ी सी अबोध ही होंगी
मैं चाहूंगी कि तुम्हारे निकट रहने वाले
परिवार, अभिभावक, शिक्षक
या तुम्हारे आसपास का परिवेश;
इनमें से कोई ऐसा हो
जो तुम्हें बताए कि
तुम्हारी महत्वता
तुम्हारी त्वचा या आँखों के रंग पर
निर्भर नहीं है,
तुम्हारी महत्वता
इस बात पर नहीं है कि
तुम्हारे श्रृंगार के बाद
किसी आयोजन में तुम चक्षुप्रिय बने रहो,
तुम्हारी महत्वता
इस बात पर नहीं है कि
तुम अपनी बात न कहना
संस्कार का हिस्सा समझो,
तुम्हारी महत्वता
उस बात पर नहीं है कि
तुम्हारे दादा, पिता, भाई, मित्र, प्रेमी या पति की
सामाजिक महत्व कितनी है;
तुम्हारी महत्वता
तुम स्वयं निर्धारित करोगी,
तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी काया
तुम्हारा श्रृंगार और स्त्रीत्व
सबकुछ ही तुम्हारे हिस्से हैं
पर वह, तुम्हारी संपूर्णता नहीं है;
तुम्हारा, तुम पर अधिकार
किसी और से सदैव ज्यादा रहे
इस बात को समझने में
तुम अपनी महत्वता समझोगी,
संसार की कोई भी अच्छी बात
परिवार, प्रेम, साथी, संस्कार
या कुछ और
यदि तुम्हें परंपराओं की कसौटी पर बांधे,
तुम रुकना, ठहरना, समझना, मूल्यांकन करना
तुम अवश्य, अपनी महत्वता समझोगी;
तुम्हारी सामाजिक, दैनिक, भौतिक
शारीरिक और भावनात्मक क्षमताएं,
तुम्हें, स्वयं निर्धारित करनी होंगी
स्वतंत्रता और निर्भरता का संतुलन
स्वयं तय करना होगा
और तुम, अपनी महत्वता समझोगी;
समाज, तुम्हारा प्रथम आंकलन
सौंदर्य के परिभाषित मापदंडों पर करेगा,
पर जब तुम अपनी परिभाषा स्वयं चुनोगी
तुम्हारा चुनाव, तुम्हारी महत्वता बनेगा
और तुम्हें जब बोध हो इन बातों का,
तुम अपने आसपास की बच्चियों का
वो परिवेश और साहस बन जाना
कि वो भी अपनी महत्वता का
सही अर्थ समझ लें।
By Dr. Madhulika Lakra

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