रूहानी सी हो चली है शाम... शम्मा बुझने को है
By Sonam singh
रूहानी सी हो चली है शाम... शम्मा बुझने को है!!
महफ़िल से शख्स हुए गुमनाम,
पर आरजू एक शक्स की होने को है,
राहो मे काटें बिछे हो मुख्तलिफ(अनेक ),
आरजू आगाज चाहती है,
रूबरू बैठे वो जरा हमारे,
यही दिल की ख्वाहिश सुबहो शाम करती है,
रवानियत(प्रवाह ) है बातों में उनकी,
दिल का बेहकना आम सा है,
आरजू जब साथ जीने की हो,
तो मुलाक़ात का सफर बेनाम क्यूँ है,
फिर रूहानी सी हो चली है शाम…. शम्मा बुझने को है!!
By Sonam singh

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