रूहानी
By Vikas Kumar
पता नहीं इस दिल में अब भी तुम्हारे लिए क्या है?
क्यूं अब भी मै उसी इश्क के लिए हीं तरसता हूं?
तुम कहती हो कि ये तो कब की बुझ चुकी।
फिर क्यूं मैं अब भी उसी आग में जलता हूं?
मेरी नज़रे क्यूं चाहती है,अब भी बस वही नज़ारे ?
वो बर्क सा बदन, लबों के शबनम, नयनों के शरारे।
वो गुदाज बाहें, जुल्फों के घनेरे साए, मदमस्त अदाएं।
काश वो पल ख्वाबों ख्यालों के इतर हकीकत बन जाये।
कब तक इन खुली आंखों के बस ख्वाबों में हीं रहोगी?
कब तक इन बंद नयनों के बस सपनों में हीं रहोगी?
कब तक मेरा तन-मन इसी आग में जलता रहेगा?
कब तक तुम भी इस अगन में हीं सुलगती रहोगी?
जिंदगी तो फकत चार दिन की, पर ये इश्क़ तो जावेदानी।
इन खुशियों का जकात करके क्यूं करें हम हिज़्र ए नादानी?
इस मुहब्बत को झुठलाना तो खुद से हीं होगी बेमानी।
क्यूं ना एक दूजे के होकर मुकम्मल करे ये इश्क़ रूहानी?
By Vikas Kumar

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