रुख़सती
- Hashtag Kalakar
- Jun 6, 2024
- 1 min read
Updated: Oct 4, 2024
By Nikhil Tandon
“एक सुबह ऐसी भी होगी
जब हम नज़र न आएंगे
भोर होगी सांझ होगी
वही गुप्प अंधेरी रात होगी
रोज़ाना वाली हर बात होगी
पर हम नज़र न आएंगे
तीज–त्योहार जब मनेंगे
सब नाते–रिश्तेदार होंगे
यारों की महफ़िल सजेगी
पर हम नज़र न आएंगे
पतझड़ में पत्तों की बौछार होगी
बसंत में हर गुल खिलेगा
सावन में रिमझिम बरसात होगी
पर हम नज़र न आएंगे
घर की एक दीवार पर
मेरी एक तस्वीर होगी
कुछ दिन सभी को
मेरी थोड़ी फ़िक्र होगी
पर हम नज़र न आएंगे
कभी अपनों की बातों में
कहीं तो मेरा ज़िक्र होगा
दिलों में दर्द–ए–हिज्र होगा
पर हम नज़र न आएंगे
ढूंढेंगी जब आंखे तुम्हारी
अपने बंद कमरे में मुझे
तुम्हें मेरे होने का एहसास होगा
पर हम नज़र न आएंगे
पढ़ोगे जब मेरे ख़त उठाकर
मेरे शब्दों मेरे ख़यालातों में तुम्हें
मेरी मौजूदगी महसूस होगी
पर हम नज़र न आएंगे
होंगे कुछ चुनिंदा मेरे चाहने वाले
मेरी नज़्मों को हर रोज़ पढ़ने वाले
जिन्हें मेरी रुख़सती का ग़म भी होगा
पर हम नज़र न आएंगे
भोर होगी सांझ होगी
वही गुप्प अंधेरी रात होगी
रोज़ाना वाली हर बात होगी
पर हम नज़र न आएंगे"
By Nikhil Tandon

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