रिहाईश / Residence
By Vidit Panchal
मैं देखता हूँ इस शहर को धूप में चलते हुए इस डर के साथ के जाने कब बारिश शुरू हो जाए। जाने कब भर आए पानी सड़कों पर कब न जाने थम जाए ट्रेफ़िक कब कहीं कोई मुलाक़ात बारिश रोक दे।
यहाँ रिवायत ख़त्म-सी हो चुकी है काग़ज़ की नावों की न छतों पर आकर बैठती हैं मस्तियाँ कभी। छन के गिरता है पानी बिजली के तारों से उसके नाले में पहुंचने तक उसमें भीगता कोई नहीं, ये शहर जैसे, सहम जाता हो बारिश में उसके जाने तक बेचैन रहता है। मैं क्यों रहूँ वहाँ जहां बारिश बेचैनी का सबब है, सुकून का नही। By Vidit Panchal

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