राहें – एक रिश्ता
By Laxmi Guria
उँगलियाँ जब फेरे तू उन केश के रास्तों से,
नीम के रस में डूबी हुई उन नदियों से |
कुछ पलकों के उठने से ,
कुछ उलझी उन गठियों से ,
ज़िन्दगी क्यों लगे अपनी सी !
सुलझाए तू उन रास्तों को ,
थामे एक लाठी सी लकड़ी को जब ,
क्यों उलझी ही रह जाए ज़िन्दगी अब तक !
क्यों चाहे केश उँगलियों का साथ फिर से अब ,
जब उन रास्तों का पता ही भुला दिया है हमने कब-का-कब |
वक्त के साथ हमने जब अपनी राहें बदलीं,
चमकते पानी ने हँसते हुए हमसे कुछ कहा |
पहले अपने होंठों को हमसे लगाया,
और जब चेहरे को कुछ इस तरह छेड़ा,
हाँथों से वो भी हमसे कुछ यूँ बिखर गयी |
पीछे मुड़कर जब हमने उसे देखा,
अंजाने ही सही,
उसने भी हमारा साथ कुछ पल बाद ही छोड़ा |
By Laxmi Guria

Comments