राही बढ़ता चल
By Yogesh Kumar Pradhan
राही तेरी एक है मंज़िल,
तेरी नैया का एक है साहिल ।
फिर वृथा मार्ग से फिरता है,
क्यों विषम राह से डरता है ।।
विराम त्याग, हुंकार भर,
विपदाओं का संहार कर ।
आगे तेरे रणभेरी है
तो क्या गर रात अंधेरी है।
तन को सहासमय तू कर ले,
तम को प्रकाशमय तू कर ले।।
क्रोधानल की तू चिंगारी है,
साहस नित प्रलयंकारी है ।
तू जला अंतर का दावानल,
पानी न मांगेगी व्यथा अचल।
भीतर का कर तू दीप्त आग,
तू छेड़ सहास का विकट राग ।
दिनमणि का तू उजवलित अंग,
कर भीतर का शीतल्य भंग ।।
तू चंडी का उन्मत्त हास,
निष्फल न होगा तेरा प्रयास।
हो बाण, कृपाण का वार व्यर्थ,
बाहुबल ही तेरा सामर्थ।।
तेरे पग का है धूल काल,
पौरुष है तेरा दीप्त भाल,
वक्षस्थल तेरा अक्षय ढाल,
सहता है हर विपदा कराल ।।
विपदाएं तुझको घेरे हों,
या शूल लाख पग तेरे हों..
तू शूल राह पर अविरत बढ़ता चल,
तेरा गुणगान करेगी श्रृष्टि सकल।।
By Yogesh Kumar Pradhan

Comments