रास्तों की कश्मकश
Updated: Oct 1, 2024
By Shubham Kabra
एक अजीब ही कश्मकश में खुद को
फंसा हुआ पा रहा हूँ |
रुकना तो मैं बिलकुल भी नहीं चाहता,
पर कदमों को आगे बढ़ने देने से क्या होगा, इससे डर भी रहा हूँ |
ये रास्ता पिछले रास्तों जैसा नहीं लगता,
जहाँ बार बार गिरकर चलना सीखने वाले को, सिकंदर कहते हैं |
इस रास्ते पर तो मैं कभी गिरना ही नहीं चाहता,
अगर गिर गया, तो होंसला नहीं, दिल टूटेगा |
तो फिर क्या मैं रुक जाऊँ,
ये कैसे हो सकता हैं ?
रास्ता तो मैं खुद बना लूंगा,
पर आगे बढ़ने के लिए,
रास्ते से ज्यादा, इशारों की जरुरत है |
By Shubham Kabra

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