राष्ट्रप्रेम की राह
By धनंजय प्रताप शर्मा
जग में छाया जब अंधकार,
हो धर्म सभ्यता पर प्रहार,
जग जीवन पर गहरा साया,
जब रक्तपात सा हो श्रृंगार,
तब तमावक्ष को चीर
एक नया सवेरा होता है,
वह रामराज्य का उदय,
रश्मिरथी नवयुग होता है,
मार्ग कंटकों पर चलकर
पथ को करता वह समतल,
अंगारों पर पांवों को धरकर
मुस्काता रहता वह जीवन भर,
सरल नहीं है, अंधकुप में
आंख बंद कर, झंझावन सहना,
सरल नहीं है, भीष्म प्रतिज्ञा
जीवन भर सुख वंचित रहना,
सरल नहीं है, मार्ग क्रांति का
क्रांतिकारी की कृति निराली,
सबने धन से वैभव को पाया
बली देय कर वह वैभवशाली,
आज कृष्ण ने मधुबन छोड़ा,
फिर राधा से नाता तोड़ा,
राम सिया से विलग हुए है,
तनु-प्राण अब अलग हुए है,
अपना तन-मन, अपना जीवन,
सुख-दुख, सबकुछ, करके अर्पण,
राष्ट्रप्रेम की राह पर राही
लिए राष्ट्र का स्वर्णिम दर्पण।
By धनंजय प्रताप शर्मा

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